अध्याय : 8 शरीर मे गति

Spread the love

❍ हमारे शरीर में स्वतः ही अनेक गतियाँ निरंतर होती रहती हैं।

❍ चलना , टहलना , दौड़ना , उड़ना , छलाँग मारना , रेंगना एवं तैरना इत्यादि।

 

❍ हम शरीर के विभिन्न भागों को उसी स्थान से मोड़ अथवा घुमा पाते हैं , जहाँ पर दो हिस्से एक-दूसरे से जुड़े हो।

❍ उदाहरण के लिए :- कोहनी , कंधा , अथवा गर्दन

❍ संधि :- हम शरीर के विभिन्न भागों को उसी स्थान से मोड़ अथवा घुमा पाते हैं , जहां पर दो हिस्सेएक-दूसरे से जुड़े हो इन स्थानों को संधि कहते हैं।

 

❍ कंदुक-खल्लिका संधि :– सभी दिशाओं में गति करता है।

❍ घुटना हिंज संधि का एक उदाहरण हैं।

❍ अचल संधि :- हमारे सिर की कुछ संधियों में अस्थि हिल नही सकती ऐसे संधियों को अचल संधि कहते हैं।

 

❍ कंकाल :- हमारे शरीर की सभी अस्थियाँ ठीक इसी प्रकार शरीर को एक सुंदर आकृति प्रदान करने के लिए एक ढाँचे का निर्माण करती हैं इस ढाँचे को कंकाल कहते हैं।

 

❍ पसली-पिंजर :- पसलियाँ वक्ष की अस्थि एवं मेरुदंड से जुड़कर एक बक्से की रचना करती हैं इस शंकुरुपी बक्शे को पसली-पिंजर कहते हैं।

❍ अस्थियाँ एवं उपस्थियाँ संयुक्त रूप से शरीर का कंकाल का निर्माण करते हैं।

 

❍ गति करने समय पेशियों के संकुचन से अस्थियाँ खिंचती हैं।

 

❍ हिंज संधि :- ऐसी संधि जो केवल आगे और पीछे एक ही दिशा में गति करती है उसे हिंज संधि कहते है।

 

❍ केंचुए में गति शरीर की पेशियों के बारी-बारी से विस्तरण एवं संकुचन से होती हैं।

 

पेशियों के जोड़े के एकांतर क्रम में सिकुड़ने एवं फैलने से अस्थियाँ गति करती हैं।

 

❍ मछली के शरीर पर पंख होते हैं जो तैरते समय जल में संतुलन बनाए रखने में एवं दिशा निर्धारण में सहायता करते हैं।

 

 

 

अध्याय : 9 सजीव एवं उनका परिवेश

Leave a Reply

Your email address will not be published.