अध्याय : 1 भारतीय संविधान

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 संविधान – एक लिखित पुस्तक है जिसमें किसी देश के शासन और प्रशासन को चलाने के लिए मूलभूत नियम होते हैं।
 

1922 में गाँधी जी ने सविधान सभा और सविधान निर्माण की मांग की 

1934 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने संविधान सभा के गठन की माँग की।

1946 में संविधान सभा का गठन किया गया।

1947 से 1949 के बीच संविधान सभा ने स्वतंत्र भारत के लिए नए संविधान का एक प्रारूप तैयार किया।

26 जनवरी 1950 को संविधान लागू हुआ।

 

संविधान की जरूरत :- आज दुनिया के ज्यादातर देशों के पास अपना संविधान है।

पहला :- संविधान ही बताता है कि हमारे समाज का मूलभूत स्वरूप क्या हो।

दूसरा :- संविधान ही ऐसे नियम तय करता है जिनके द्वारा राजनेताओं के हाथों सत्ता के दुरुपयोग को रोका जा सकता है।

तीसरा :- भारतीय संविधान देश के सभी व्यक्तियों को समानता का अधिकार देता है।

( धर्म , नस्ल , जाति , लिंग और जन्मस्थान के आधार पर देश के किसी नागरिक के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता। )

अंतर-सामुदायिक वर्चस्व :- एक समुदाय द्वारा दूसरे समुदाय को दबाना।

अंत:सामुदायिक वर्चस्व :- एक ही समुदाय के भीतर कुछ लोग दूसरे को दबा देते है।

 

 

भारतीय संविधान मुख्य लक्षण

भारत को एक लोकतांत्रिक देश होना चाहिए। सभी नागरिक को समान अधिकार प्राप्त हो।

राष्ट्रीय एकता को बनाए रखने के लिए विविधता के प्रति सम्मान दिखाई देता है।

 

1. संघवाद :- देश में एक से ज़्यादा स्तर की सरकारों का होना। केंद्र सरकार और राज्य सरकार।

मतभेद को दूर करने के लिए संविधान में विभिन्न विषयों को तीन सूचियों में बाँट दिया गया

संघ सूची 97 :- केंद्र सरकार पूरे देश के लिए नीति , नियम , कानून , योजना बनायेगी। रक्षा , मुद्रा , बैंकिंग , विदेशी मामले आदि।

राज्य सूची 66 :- राज्य सरकार :- ज्यादा स्वायत्तता और आजादी मिलनी चाहिए। शिक्षा , स्वास्थ्य ,वाणिज्य , पुलिस आदि ।

समवर्ती सूची 47 :- केंद्र और राज्य सरकारे , दोनों संयुक्त रूप से फैसला ले सकते थे। वन , कृषि , शिक्षा , गोद लेना आदि।

 

2. संसदीय शासन पद्धति :- सरकार के सभी स्तरों पर प्रतिनिधियों का चुनाव लोग खुद करते हैं।

भारत का संविधान अपने सभी वयस्क नागरिकों को वोट डालने का अधिकार देता है।

सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार :- 21 साल से ज्यादा उम्र के सभी भारतीयों को प्रांतीय और राष्ट्रीय चुनावों में वोट देने का अधिकार था।

जनता अपने प्रतिनिधियों के चुनाव में देश के सभी लोगों की सीधी भूमिका होती है।

ये प्रतिनिधि जनता के प्रति जवाबदेह होते है। हर व्यक्ति खुद चुनाव भी लड़ सकता है।

 

3. शक्तियों का बँटवारा :- संविधान के अनुसार सरकार के तीन अंग हैं – विधायिका , कार्यपालिका , और न्यायपालिका ।

विधायिका :- में हमारे निर्वाचित प्रतिनिधि होते हैं।

कार्यपालिका :- जो कानूनों को लागू करने और शासन चलाने का काम देखते हैं।

न्यापालिका :- न्यायालयों की व्यवस्था को न्यायपालिका कहा जाता है।

 

 

मौलिक अधिकार :- मौलिक अधिकारों वाला खंड भारतीय संविधान की ‘ अंतरात्मा ‘ भी कहलाता है।

 

1. समानता का अधिकार :- कानून की नजर में सभी लोग समान हैं। धर्म , जाति , लिंग , जन्मस्थान के आधार पर किसी भी नागरिक के साथ भेदभाव नही किया जा सकता।

2. स्वतंत्रता का अधिकार :- इस अधिकार के अंतर्गत अभिव्यक्ति और भाषण की स्वतंत्रता , सभा /संगठन बनाने की स्वतंत्रता , देश के किसी भी भाग में आने-जाने और रहने तथा कोई भी व्यवसाय , पेशा या कारोबार करने का अधिकार शामिल है।

3. शोषण के विरुद्ध अधिकार :- मानव व्यापार , जबरिया श्रम और 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को मजदूरी पर रखना अपराध है।

4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार :- प्रत्येक व्यक्ति को अपनी इच्छा को मजदूरी पर रखना अपराध है।

5. संस्कृतिक और शैक्षणिक अधिकार :- संविधान में कहा गया है कि धार्मिक या भाषाई , सभी अल्पसंख्यक समुद…

6. धर्मनिरपेक्ष :- सभी को अपने धार्मिक विश्वासों एवं मान्यताओं को पूरी आज़ादी से मानने की छूट देता है।

 

राज्य अधिकृत रूप से किसी भी धर्म को राजकीय धर्म के रूप में बढ़ावा नही देता। 

 

संविधान सभा प्रारूप समिति के अध्यक्ष – डॉ. भीम राव अम्बेडकर

संविधान सभा के स्थायी अध्यक्ष – डॉ. राजेन्द्र प्रसाद

संविधान सभा के अस्थयी अध्यक्ष – सचिदानंद सिन्हा

संविधान सभा के उपाध्यक्ष – हरेन्द्र कुमार मुखर्जी वी टी कृष्णमचारी

मूल अधिकार व प्रांत समिति के अध्यक्ष – सरदार वल्लभ भाई पटेल 

संघ समिति के अध्यक्ष – जवाहर लाल नेहरू

संवैधानिक सलाहकार – बी एन राव

 

 

 

अध्याय 2 – धर्मनिरपेक्षता की समझ 

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