अध्याय 3 – ग्रामीण क्षेत्र पर शासन चलाना

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 कम्पनी दिवान बन गई :- 12 अगस्त 1765 को मुग़ल बादशाह ने ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल का दिवान तैनात किया। बंगाल की दीवानी हाथ आ जाना अंग्रेजों के लिए एक निश्चय ही एक बड़ी घटना थी। दिवान के तौर पर कंपनी अपने नियंत्रण वाले भूभाग के आर्थिक मामलों की मुख्य शासक बन गई थी।

 

 कम्पनी की आमदनी :- कंपनी दिवान तो बन गई थी लेकिन अभी भी खुद को एक व्यापारी ही मानती थी। कंपनी भारी-भरकम लगान तो चाहती थी लेकिन उसके आकलन और वसूली की कोई नियमित व्यवस्था करने में हिचकिचा रही थी। उसकी कोशिश यही थी कि वह ज्यादा से ज्यादा राजस्व हासिल करे और कम से कम कीमत पर बढिया सूती और रेशमी कपड़ा खरीदे।

– पाँच साल के भीतर बंगाल में कंपनी द्वारा खरीदी जाने वाली चीजों का कुल मूल्य दोगुना हो चुका था।
– 1865 से पहले कंपनी ब्रिटेन से सोने चाँदी का आयात करती थी और इन चीजों के बदले सामान ख़रीदती थी।
– अब बंगाल में इकट्ठा होने वाले पैसे से ही निर्यात के लिए चीजों ख़रीदी जा सकती थीं।

खेती में सुधार की जरूरत :- कंपनी ने 1793 में स्थायी बंदोबस्त लागू किया। इस बंदोबस्त की शर्तो के हिसाब से राजाओं और तालुकदारो को जमींदारों के रूप में मान्यता दी गई। उन्हें किसानों से लगान वसूलने और कंपनी को राजस्व चुकाने का जिम्मा सौंपा गया ।

 

समस्या :- स्थयी बंदोबस्त ने भी समस्या पैदा कर दी। कंपनी के अफ़सरो ने पाया की अभी भी जमींदार जमीन में सुधार के लिए खर्चा नहीं कर रहे थे। असल में , कंपनी ने जो राजस्व तय किया था वह इतना ज़्यादा था की उसको चुकाने में जमीदारों को भारी परेशानी हो रही थी। जो जमींदार राजस्व चुकाने में विफल हो जाता था उसकी जमींदारी छीन ली जाती थी। बहुत सारी जमींदारियों को कंपनी बाकायदा नीलम कर चुकी थी। दूसरी तरफ , गाँवो में किसानों को यह व्यवस्था बहुत दमनकारी दिखाई दी। किसान लगान चुकाने के लिए अकसर महाजन से कर्जा लेना पड़ता था। अगर वह लगान नहीं चुका पाता था तो उसे पुश्तैनी जमीन से बेदखल कर दिया जाता था।

 

महल :- ब्रिटिश राजस्व दस्तावेजों में महल एक राजस्व इकाई थी। यह एक गाँव या गाँवो का एक समूह होती थी।

 

एक नयी व्यवस्था :- उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में बंगाल प्रेज़िडेंसी के उत्तर-पश्चिमी प्रांतो के लिए होल्ट मैकेंजी नामक अंग्रेज़ ने एक नयी व्यवस्था तैयार की जिसे 1822 में लागू किया गया। मैकेंजी गाँव के एक-एक खेत के अनुमानित राजस्व को जोड़कर हर गाँव या ग्राम समूह ( महाल ) से वसूल होने वाले राजस्व का हिसाब लगाया जाता था।

 

महलवारी बंदोबस्त :- जिसमें राजस्व इकट्ठा करने और उसे कंपनी को अदा करने का जिम्मा जमींदार की बजाय गाँव के मुखिया को सौंपा दिया गया। इस व्यवस्था को महलवारी बंदोबस्त का नाम दिया गया।

रैयतवारी व्यवस्था :- ब्रिटिश नियंत्रण वाले दक्षिण इलाकों में भी स्थायी बंदोबस्त की जगह नयी व्यवस्था लागू किया गया जिसे रैयतवार ( या रैयतवारी ) का नाम दिया गया। रीड और मुनरो को लगता था की दक्षिण में परंपरागत जमींदार नहीं थे। इसलिए उन्हें सीधे किसानों ( रैयतों ) से ही बंदोबस्त करना चहिए जो पीढ़ियों से जमीन पर खेती करते आ रहे हैं। मुनरो का मानना था की अग्रेजों पिता की भाँति किसानों की रक्षा करनी चाहिए।

 

यूरोप के लिए फ़सले :- अठाहरवीं सदी के आखिर तक कंपनी ने अफ़ीम और नील की खेती पर ज़ोर लगा दिया था। इसके बाद अन्य फसलें जैसे बंगाल में पटसन , असम में चाय , पंजाब में गेंहूँ , महाराष्ट्र में कपास , मद्रास में चावल , सयुंक्त प्रांत ( वर्तमान उत्तर प्रदेश में ) में गन्ना।

 

भारतीय नील की माँग क्यों थी :- नील का पौधा मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय इलाकों में ही उगता है। तेरहवीं सदी तक इटली , फ़्रांस और ब्रिटेन के कपड़ा उत्पादक कपड़े की रँगाई के लिए भरतीय नील का इस्तेमाल कर रहे थे। उस समय भरतीय नील की बहुत थोड़ी मात्रा ही यूरोपीय बाज़ारों में पहुँचती थी।यूरोप में लोग कपड़े को रँगने वाले तो नील को ही पसंद करते थे। नील से बहुत चमकदार नीला रंग मिलता था। इसलिए भरतीय नील की माँग बढ़ने लगी।

 

अठारहवीं शताब्दी के आखिर तक भरतीय नील की माँग और बढ़ गई। ब्रिटेन में औद्योगीकरण का युग शुरू हो चुका थाऔर उसके कपास उत्पादन में भारी इजाफ़ा हुआ। अब कपड़ो की रँगाई की माँग और तेजी से बढ़ने लगी। बंगाल में नील की खेती तेज़ी से फैलने लगी थी। बंगाल में पैदा होने वाला नील दुनिया के बाजारों में छा गया था।1778 में ब्रिटेन द्वारा आयत किए गए नील में भरतीय नील का हिस्सा केवल 30 प्रतिशत था। 1810 में ब्रिटेन द्वारा आयत किए गए नील में भारतीय नील का हिस्सा 95 प्रतिशत हो चुका था।

बागान :- एक विशाल खेत जिस पर बागान मालिक बहुत सारे लोगों से जबरन काम करवाता था। कॉफी , गन्ना , तंबाकू , चाय , और कपास आदि।

 

गुलाम :- ऐसा व्यक्ति जो किसी दास-स्वामी की संपत्ति होता है। गुलाम के पास कोई आज़ादी नहीं होती , उसे अपने मालिक के लिए काम करना होता है।

 

नील की खेती कैसे होती थी :-

नील की खेती के मुख्य तरीके थे – निज :- निज खेती की व्यवस्था में बागान खुद अपनी जमीन में नील का उत्पादन करते थे। या तो वह जमीन खरीद लेते थे या दूसरे जमींदारों से जमीन भाड़े पर ले लेते थे और मजदूरों को काम पर लगाकर नील की खेती करवाते थे।

 

रैयत :- रैयत व्यवस्था के तहत बागान मालिक रैयतों के साथ एक अनुबंध ( सट्टा ) करते थे। कई बार वे गाँव के मुखियाओं को भी रैयतों की तरफ से समझौता करने के लिए बाध्य कर देते थे। जो अनुबंध पर दस्तखत कर देते थे उन्हें नील उगाने के लिए कम ब्याज़ दर पर बागान मालिकों से नक़द कर्जा मिला जाता था। बागान मालिक बीज उपकरण मुहैया कराते थे जबकि मिट्टी को तैयार करने , बीज बोने और फ़सल की देखभाल करने की जिम्मा काश्तकारों के ऊपर रहता था।

 

बीघा :- जमीन की एक माप। ब्रिटिश शासन से पहले बीघे का आकार अलग-अलग होता था। बंगाल में अंग्रेजो ने इसका क्षेत्रफल करीब एक तिहाई एकड़ तय कर दिया था। नील विद्रोह :- 1859 में बंगाल के हजारों रैयतों ने नील की खेती से इनकार कर दिया। जैसे-जैसे विद्रोह फैला , रैयतों ने बागान मालिकों को लगान चुकाने से भी इनकार कर दिया। रैयतों ने कसम खा ली कि न तो वे नील की खेती के लिए कर्जा लेंगे और न ही बागान मालिकों के लठियालों – लाठीधारी गुंडों -से डरेंगे।

 

 

 

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