अध्याय 2 – व्यापार से साम्राज्य तक कंपनी की सत्ता स्थापित होती है

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मुग़ल बादशाहों में औरंगज़ेब आखिरी शक्तिशाली बादशाह थे। उन्होंने वर्तमान भारत के नए बहुत बड़े हिस्से पर नियंत्रण स्थापित कर लिया था।  1707 में उनकी मृत्यु के बाद बहुत सारे मुग़ल सूबेदार और बड़े-बड़े जमींदार अपनी दिखाने लगे थे। उन्होंने अपनी क्षेत्रीय रियासतें कायम कर ली थी ।

कंपनी का आगमन :- अठारहवीं सदी के उत्तरार्ध तक राजनीतिक क्षितिज पर अंग्रेजो के रूप में एक नयी ताकत उभरने लगी थी।
अंग्रेज पहले-पहल एक छोटी-सी व्यापारिक कंपनी के रूप में भारत आए थे। बाद में विशाल साम्राज्य के स्वामी बन बैठे। कैप्टन हडसन द्वारा बहादुर ज़फ़र और उनके बेटो की गिरफ्तारी हुई।  1857 में ब्रिटिश शासन के विरूद्ध भारी विद्रोह शुरू हो गया तो विद्रोहियों ने मुग़ल बादशाह बहादुर शाह जफ़र को ही अपना नेता मान लिया था।

 

वाणिज्यिक :- एक ऐसा व्यावसायिक उद्यम जिसमें चीजों को सस्ती कीमत पर खरीद कर और ज्यादा कीमत पर बेचकर यानी मुख्य रूप से व्यापार के जरिए मुनाफ़ा कमाया जाता है।

 

पूर्व में ईस्ट कंपनी का आगमन :- सन 1600 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ प्रथम से चार्टर अर्थात इजाजतनामा हासिल कर लिया जिससे कंपनी को पूरब से व्यापार करने का एकाधिकार मिल गया।

इस इज्जतनामे का मतलब यह था कि इंग्लैंड को कोई और व्यापारिक कंपनी इस इलाके में ईस्ट इंडिया कंपनी से होड़ नही कर सकती थी। उस ज़माने में वाणिज्यिक कंपनी मोटे तौर पर प्रतिस्पर्धा से बचकर ही मुनाफ कमा सकती थीं। अगर कोई प्रतिस्पर्धा न हो तभी वे सस्ती चीजें खरीदकर उन्हें ज्यादा कीमत पर बेच सकती थी।

 

भारत की खोज :- पुर्तगाल के खोजी यात्री वास्को डी गामा ने ही 1498 में पहली बार भारत तक पहुँचने के इस समुद्री मार्ग का पता लगाया था। सत्रहवीं शताब्दी की शुरुआत तक डच भी हिंद महासागर में व्यापार की संभावनाएं तलाशने लगे थे। कुछ ही समय बाद फ्रांसीसी व्यापारी भी सामने आ गए।  यूरोप के बाजारों में भारत के बने बारीक सूती कपड़े और रेशम की जबरदस्त माँग थी। इनके अलावा काली मिर्च , लौंग , इलायची , और दालचीनी की भी जबरदस्त माँग रहती थी।

यूरोपीय कंपनियों के बीच इस बढ़ती प्रतिस्पर्धा से भारतीय बाजारों में इन चीजों की कीमतें बढ़ने लगीं और उनसे मिलने वाला मुनाफा गिरने लगा। सत्रहवीं और अठारहवीं सदी सदी में एक कंपनी किसी दूसरे कंपनी के जहाज डुबो देती , रास्ते मे रुकावटें खड़ी कर देती और माल से लदे जहाजों को आगे बढ़ने से रोक देती।

 

ईस्ट इंडिया कंपनी बंगाल में व्यापार शुरू करती है

पहली इंग्लिश फैक्टरी 1651 में हुगली नदी के किनारे शुरू हुई। कंपनी के व्यापारी यहीं से अपना काम चलाते थे। इन व्यापारियों को उस जमाने में ” फैक्टर “ कहा जाता था। इस फैक्टरी में वेयरहाउस था जहाँ निर्मात होने वाली चीजों को जमा किया जाता था।

 तक कंपनी ने इस आबादी के चारों तरफ एक किला बनाना शुरू कर दिया था। दो साल बाद उसने मुग़ल अफसरों को रिश्वत तीन गाँवो की जमींदारी भी खरीद ली। इनमें से एक गाँव कालीकता था जो बाद में कलकत्ता बना। अब इसे कोलकाता कहा जाता है।
 ( फरमान :- एक शाही आदेश होता हैंऔरंगजेब के फरमान से केवल कंपनी को ही शुल्क मुक्त व्यापार का अधिकार मिला था।

 

व्यापार से युद्धों तक :- अठारहवीं सदी की शुरुआत में कंपनी और बंगाल के नवाबों का टकराव काफी बढ़ गया था। ऐसे में बंगाल के नवाब अपनी ताकत दिखाने लगे थे। मुर्शिद कुली खान के बाद अली वर्दी खान और उसके बाद सिराजुद्दोला बंगाल के नवाब बने। ये सभी शक्तिशाली शासक थे। उन्होंने कंपनी को रियायतें देने से मना कर दिया। व्यापार का अधिकार देने के बदले कंपनी से नज़राने माँगे , किलेबन्दी को बढ़ाने से रोका , सिक्के ढालने का अधिकार नही दिया। ये टकराव दिनोदिन गंभीर होते गए। अंत: इन टकरावों की परिणति प्लासी के प्रसिद्ध युद्ध के रूप में हुई।

 

प्लासी का युद्ध :- 1756 मे अली वर्दी खान की मृत्यु के बाद सिराजुद्दोला बंगाल के नवाब बने। कंपनी को सिराजुद्दोला की ताकत से काफ़ी भय था। सिराजुद्दोला की जगह कंपनी एक ऐसा कठपुतली नवाब चाहती थी जो उसे व्यापारिक रियायते और अन्य सुविधाएँ आसानी से देने में आनाकानी न करें

 

 कंपनी ने बंगाल के नवाब सिराजुद्दोला के प्रतिद्वंद्वीयों में से किसी को नवाब बना दिया जाए । जवाब में सिराजुद्दोला हुक्म दिया कि कंपनी उनके राज्य में के राजनीतिक मामलों में टाँग अड़ाना बंद कर दे , किलेबंदी रोके , और बाकायदा राजस्व चुकाए । दोनों के बीच मतभेद के कारण 1757 में रॉबर्ट क्लाइव और सिराजुद्दोला के बीच प्लासी का युद्ध हुआ। जिसमें सिराजुद्दोला की हार का एक बड़ा कारण उसके सेनापतियों में से एक सेनापति मीर जाफ़र की कारगुजारियाँ भी थी।

 प्लासी की जंग इसलिए महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि भारत में यह कंपनी की पहली बड़ी जीत थी।

 

1764 बक्सर का युद्ध :- बंगाल के नवाब मीर जाफ़र को बनाया गया जब मीर जाफ़र ने कंपनी का विरोध किया तो कंपनी ने उसे हटकर मीर कासिम को नवाब बना दिया। जब मीर कासिम परेशान करने लगा तो 1764 बक्सर का युद्ध में उसको भी हराना पड़ा। फिर मीर जाफ़र को नवाब बनाया लेकिन जब मीर जाफ़र की मृत्यु के बाद रॉबर्ट क्लाइव ने ऐलान किया कि अब ” हम खुद ही नवाब बनना पड़ेगा।

आखिरकार 1765 में मुग़ल सम्राट ने कंपनी को ही बंगाल प्रांत के दीवान नियुक्त कर दिया , दीवानी मिलने के कारण कंपनी को बंगाल के विशाल राजस्व संसाधनों पर नियंत्रण मिल गया था।

 

 

 कंपनी के अफ़सर ‘ नवाब ‘ बन बैठे :

 कंपनी के पास अब सत्ता और ताकत थी।कंपनी का हर कर्मचारी नवाबों की तरह जीने के ख्वाब देखने लगा था। प्लासी के युद्ध के बाद कंपनी को निजी तोहफे के तौर पर जमीन और बहुत सारा पैसा मिला। खुद रॉबर्ट क्लाइव ने ही भारत से बेहिसाब दौलत जमा कर ली।

1743 में जब वह इंग्लैंड से मद्रास ( अब चैन्नई ) आया था तो उसकी उम्र 18 साल थी। 1767 में जब वह दो बार गवर्नर बनने के बाद हमेशा के लिए भारत से रवाना हुआ तो यहाँ उसकी दौलत 401,102 पौंड के बराबर थी। 1772 में ब्रिटिश संसद में उसे खुद भ्रष्टाचार के आरोपों पर अपनी सफ़ाई देनी पड़ी। सरकार को उसकी अकूत संपत्ति के स्रोत संदेहास्पद लग रहे थे। उसे भ्रष्टाचार आरोपों से बरी तो कर दिया गया लेकिन 1774 में उसने आत्महत्या कर ली।

 

कंपनी का फैलता शासन :- बक्सर की लड़ाई (1764 ) के बाद कंपनी ने भारतीय रियासतों में रिजिडेंट तैनात कर दिये।ये कंपनी के राजनितिक या व्यावसायिक प्रतिनिधि होते थे। उनका काम कंपनी के हितों की रक्षा करना और उन्हें आगे बढ़ाना था।

 

” सहायक संधि ” :- जो रियासत इस बंदोबस्त को मन लेती थी उसे अपनी स्वतंत्र सेनाएँ रखने का अधिकार नहीं रहता था। उसे कंपनी की तरफ से सुरक्षा मिलती थी और ‘‘ सहायक सेना ” के रखरखाव के लिए वः कंपनी को पैसा देती थी।

 

 टीपू सुल्तान :- शेर-ए-मैसूर हैदर अली ( शासन काल 1782 से 1799 ) और उनके विख्यात पुत्र टीपू सुल्तान ( शासन काल 1782 से 1799 ) जैसे शक्तिशाली शासकों के नेतृत्व में मैसूर काफ़ी ताकतवर हो चुका था। मालाबार तट पर होने वाला व्यापर मैसूर रियासत के नियंत्रण में था जहाँ से कंपनी काली मिर्च और इलायची खरीदती थी। 1785 में टीपू सुल्तान ने अपनी रियासत में पड़ने वाले बंदरगाहों से चंदन की लकड़ी , काली मिर्च और इलायची का निर्यात रोक दिया। टीपू सुल्तान ने भारत में रहने वाले फ़्रांसिसी व्यापारियों से घनिष्ठ संबंध विकसित किए और उनकी मदद से अपनी सेना का आधुनिकीकरण किया।

 

 सुल्तान के इन कदमों से अंग्रेज़ आग-बबूला हो गए फलस्वरूप मैसूर के साथ अंग्रेज़ो की चार बार जंग हुई। ( 1767-69 , 1780-84 , 1790-92 , और 1799 ) श्रीरंगपट्म की आखिरी जंग में कंपनी को सफलता मिली।अपनी राजधानी की रक्षा करते हुए टीपू सुल्तान मारे गए और मैसूर का राजकाज पुराने वोडियर राजवंश के हाथों में सौंप दिया गया।

 

मराठों से लड़ाई :- 1761 में पानीपत की तीसरी लड़ाई में हार के बाद दिल्ली से देश का शासन चलाने का मराठों का सपना चूर-चूर हो गया। उन्हें कई राज्यों में बाँट दिया गया। की राज्यों की बागडोर सिंधिया , होलकर , गायकवाड और भोंसले जैसे अलग-अलग राजवंशो के हाथो में थी। ये सारे सरदार एक पेशवा ( सर्वोच्च मंत्री ) के अंतर्गत एक कन्फ़ेडरेसी ( रजमण्डल ) के सदस्य थे। पेशवा इस राज्यमण्डल का सैनिक और प्रशासकीय प्रमुख होता था और पुणे में रहता था। महाद्जी सिंधिया और नाना फड़नीस अठारहवीं सदी के आखिर के दो प्रसिद्ध मराठा योद्धा और राजनीतिज्ञ थे।

 

पहला युद्ध 1782 में सालबाई संधि के साथ खत्म हुआ। दूसरा अंग्रेज-मराठा 1803-05 कई मोर्चो पर लड़ा गया। नतीजा यह हुआ की उड़ीसा , आगरा , दिल्ली कई भूभाग अंग्रेजों के कब्ज़े में आ गए। तीसरा यद्ध 1817-19 अंग्रेजों ने मराठों की ताकत को पूरी तरह से कुचल दिया।

 

 क्षेत्रीय विस्तार की आक्रामक नीति :- लॉर्ड हेस्टिंग्स ( 1813-1823 तक गवर्नर जनरल ) के नेतृत्व में ” सर्वोच्च ” की एक नई नीति शुरू की गयी। कंपनी का दावा था की उसकी सत्ता सर्वोच्च है इसलिए वह भारतीय राज्यों से ऊपर है। 1838-42 के बीच अफगानिस्तान के साथ लंबी लड़ाई लड़ी और अप्रत्यक्ष कंपनी शासन स्थापित कर लिया। 1843 में सिंध भी कब्जे में आ गया। इसके बाद पंजाब की बारी थी। यहाँ महराजा रणजीत सिंह ने कंपनी की दाल नहीं गलने दी। 1839 में उनकी मृत्यु के बाद इस रियासत के साथ दो लंबी लड़ाइयाँ हुई और आखिरकार 1849 में अंग्रेजो ने पंजाब का भी अधिग्रहण कर लिया।

 

 विलय निति :- लॉर्ड डलहौजी ने एक नई नीति अपनाई जिसे विलय की नीति का नाम दिया गया। यह सिद्धांत इस तर्क पर आधारित था की अगर किसी शासक की मृत्यु हो जाती है और उसका कोई पुरुष वारिस नहीं हैं तो उनकी रियासत हड़प कर ली जाएगी यानी कंपनी के भूभाग का हिस्सा बन जाएगी। इस सिंद्धात के आधार पे एक के बाद एक की रियासतें – सतारा ( 1848 ) , संबलपुर ( 1850 ) , उदयपुर ( 1852 ) , नागपुर ( 1853 ) , और झाँसी ( 1854 ) अंग्रेजों के हाथ में चली गयी।

 

नए शासन की स्थापना :- ब्रिटिश इलाके मोटे तौर प्रशासकीय इकाइयों में बँटे हुए थे जिन्हें प्रेजीडेंसी कहा जाता था। उस समय तीन प्रेजीडेंसी थीं – बंगाल , मद्रास , और बम्बई ।

 

न्याय व्यवस्था :- 1772 में एक नयी न्याय व्यवस्था स्थापित की गई । इस व्यवस्था में प्रावधान किया गया कि हर जिले में दो अदालतें होंगी – फ़ौजदारी अदालत और दीवानी अदालत ।

1773 के रेग्युलेटिंग एक्ट के तहत एक नए सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना की गई

 

 कंपनी की फ़ौज :- कंपनी के साथ भारत मे शासन और सुधार के ने विचार तो आए लेकिन उसकी असली सत्ता सैनिक ताकत थी। उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में अंग्रेज एक समरूप सैनिक विकसित करने लगे थे । सिपाहियों को यूरोपीय ढंग का प्रशिक्षण , अभ्यास और अनुशासन सिखाया जाने लगा।

 

 निष्कर्ष :- ईस्ट इंडिया कंपनी एक व्यापारिक कंपनी से बढ़ते-बढ़ते एक भौगोलिक औपनिवेशिक शक्ति बन गई। 1857 तक भारतीय उपमहाद्वीप के 63 प्रतिशत भूभाग और 78 प्रतिशत आबादी पर कंपनी का सीधा शासन स्थापित हो चुका था।देश के शेष भूभाग और आबादी पर कंपनी का अप्रत्यक्ष प्रभाव था।

 

 

 

अध्याय 3 – ग्रामीण क्षेत्र पर शासन चलाना

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