अध्याय 5 : जन-संघर्ष और आंदोलन | People’s Struggle and Movement

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 नेपाल और बोलीविया में जन संघर्ष। नेपाल में लोकतंत्र का आंदोलन। बोलीविया का जल युद्ध। लोकतंत्र और जन संघर्ष। लामबंदी और संगठन। दबाव-समूह और आंदोलन।

 

❍ नेपाल में लोकतंत्र का आंदोलन

• नेपाल में लोकतंत्र 1990 में कायम हुआ।

• राजा वीरेन्द्र , जिन्होंने सवैंधानिक राजशाही को स्वीकार किया है , उनकी 2001 में शाही परिवार के एक रहस्यम कत्लेआम में हत्या हो गयी।

• नेपाल के नए राजा , ज्ञानेंद्र लोकतांत्रिक शासन को स्वीकार करने के लिए तैयार नही थे।

• फरवरी 2005 में राजा गजेंद्र ने तत्कालीन प्रधानमंत्री को बर्खास्त करके जनता द्वारा निर्वाचित सरकार को भंग कर दिया

• 2006 की अप्रैल में जो आंदोलन उठ खड़ा हुआ उसका लक्ष्य शासन की बागडोर राजा के हाथ से लेकर दोबारा जनता के हाथों में सौंपना था।

• संसद की सभी बड़ी राजनीतिक पार्टियों ने एक ‘ सेवेन पार्टी अलायंस’ ( सप्तदलीय गठबंधन – एस. पी.ए. ) बनाया और नेपाल की राजधानी काठमांडू में चार दिन के बंद का आह्वान किया।

• इस प्रतिरोध में जल्दी ही अनियतकालीन ‘बंद’ का रूप ले लिया और इसमें माओवादी बागी तथा अन्य संगठन भी साथ हो लिए।

• उन्होंने संसद बहल करने , सर्वदलीय सरकार बनाने तथा एक नयी संविधान सभा की मांग की।

• 24 अप्रैल 2006 में अल्टीमेट अंतिम दिन, राजा ने तीन मांगों को स्वीकार करने के लिए मजबूर किया गया।

• एस.पी.ए. ने गिरीजा प्रसाद कोईराला को अंतिम सरकार का प्रधानमंत्री चुना।

• माओवादियों और एस.पी.ए. के बीच नए संविधान बनाने की सहमति हुई।

• 2008 में राजतंत्र को खत्म किया और नेपाल संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य बन गया

• 2015 में यहाँ एक नये संविधान को अपनाया गया

 

○ बोलिविया का जल युद्ध

• बोलीविया लातिनी अमरीका का एक गरीब देश है।

•विश्व बैंक ने यहां की सरकार पर नगर पालिका द्वारा की जा रही जलापूर्ति से अपना नियंत्रण छोड़ने के लिए दबाव डाला।

• सरकार ने कोचंबंबा शहर में जलापूर्ति के अधिकार एक बहुराष्ट्रीय कंपनी को बेच दिया।

• इस कंपनी ने पानी की कीमत चार गुना इजाफा कर दिया।

• इसके फलस्वरूप स्वत: स्फूर्त जन-संघर्ष भड़क उठा।

• जनवरी 2000 में श्रमिकों मानवाधिकारों कार्यकर्ताओं तथा सामुदायिक नेताओं के बीच एक गठबंधन ने आकार ग्रहण किया और इस गठबंधन ने शहर में चार दिनों की कामयाब आम हड़ताल की।

• सरकार बातचीत के लिए राजी हुई और हड़ताल वापस ले ली गई लेकिन जनता को कुछ भी हाथ नहीं लगा। फरवरी में फिर आंदोलन शुरू हुआ लेकिन पुलिस ने बलपूर्वक दमन किया और सरकार ने मार्शल लॉ लगा दिया।

• जनता की ताकत के आगे बहुराष्ट्रीय कंपनी के अधिकारियों को शहर छोड़कर भागना पड़ा।

• सरकार को आंदोलनकारियों की सारी मांगे माननी पड़ी ।

• सरकार को राष्ट्रीय कंपनी के साथ किया गया करार रद्द कर दिया गया।

• जलापूर्ति दोबारा नगरपालिका को सौंपकर पुरानी दरें कायम कर दी गई।

• इस आंदोलन को बोलिविया के जल युद्ध के नाम से जाना गया

 

○ लामबंदी और संगठन

○ नेपाल के संघर्ष में योगदान :-

• एस. पी.ए या सप्तदलीय गठबंधन जिसमें कुछ बड़ी पार्टियां शामिल थी जिनके संसद में सदस्य थे।

• संघर्ष में नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) भी शामिल हुई, जो संसदीय लोकतंत्र में विश्वास नही करती थी।

• राजनीतिक दलों के अलावा, सभी प्रमुख श्रमिक संघ और उनके परिसंघों ने आंदोलन में भाग लिया।

• स्वदेशी लोगों , शिक्षकों , वकीलों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के समूह ने भी आंदोलन में समर्थन दिया।

 

○ बोलिविया के संघर्ष में योगदान :-

• बोलिविया में जल का निजीकरण के विरोध में (FEDECOR) नामक संगठन ने नेतृत्व किया।

• इस संगठन में इंजीनियर और पर्यावरणवादी समेत स्थानीय कामकाजी लोग शामिल थे।

• इस संगठन को सिंचाई पर निर्भर किसानों के एक संघ कारखाना-मजदूरों के संगठन के परिसंघ कोचबंबा विश्वविद्यालय के छात्रों तथा शहर में बढ़ती बेघर-बार बच्चों की आबादी का समर्थन मिला।

• इस आंदोलन को ‘ सोशलिस्ट पार्टी ‘ ने भी समर्थन दिया।

• सन 2006 में बोलिविया में सोशलिस्ट पार्टी को सत्ता हासिल हुई।

 

 

 

○ राजनीतिक दलों और दबाव समूहों के बीच अन्तर

• दबाव समूह सीधे सत्ता का आनंद नहीं लेते हैं , जबकि राजनीतिक दल ऐसा करते हैं।

• दबाव समूह आमतौर पर समाज के किसी विशेष खंड या दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करते हैं ; दूसरी ओर , राजनीतिक दल बड़े सामाजिक विभाजन का प्रतिनिधित्व करते हैं ।

• दबाव समूह चुनाव नहीं लड़ते हैं , जबकि राजनीतिक दल चुनाव लड़ते हैं और सरकार चलाते हैं ।

• एक समय पर , एक व्यक्ति केवल एक राजनीतिक दल का सदस्य हो सकता है लेकिन कई दबाव समूहों का सदस्य हो सकता है ।

• दबाव समूहों के उदाहरण वकील एसोसिएशन , ट्रेड शिक्षक एसोसिएशन , ट्रेड यूनियन आदि।

• राजनीतिक दलों में भाजपा , कांग्रेस , आदि

 

 

○ दबाव समूह आंदोलन

• दबाव समूह वे संगठन हैं जो सरकारी नीतियों को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं ।

• ये संगठन तब बनते हैं जब एक सामान्य उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए सामान्य व्यवसाय , रुचि , आकांक्षाओं या विचारों वाले लोग एक साथ आते हैं।

• एक हित समूह की तरह , एक आंदोलन भी चुनावी प्रतिस्पर्धा में सीधे भाग लेने के बजाय राजनीति को प्रभावित करने का प्रयास करता है।

• उदाहरण हैं नर्मदा बचाओ आंदोलन , सूचना का अधिकार आंदोलन , शराब विरोधी आंदोलन , महिलाओं का आंदोलन , पर्यावरण आंदोलन।

• हित समूहों के विपरीत , आंदोलनों में एक ढीला संगठनहै।

• उनका निर्णय लेना अधिक अनौपचारिक और लचीला है ।

• वे सहज सामूहिक भागीदारी पर बहुत अधिक निर्भर करते हैं ।

 

○ वर्ग विशेष के हित समूह

• वे समाज के किसी विशेष वर्ग या समूह के हितों को बढ़ावा देना चाहते हैं जैसे कि श्रमिक , कर्मचारी , व्यवसायी , उद्योगपति आदि।

• उदाहरण के तौर पर ट्रेड यूनियन , व्यापारिक संघ हैं ।

• उनकी मुख्य चिंता उनके सदस्यों की बेहतरी और भलाई है , न कि सामान्य रूप से समाज की भलाई ।

 

 

○ जन सामान्य के हित समूह

• इन्हें लोक कल्याणकारी समूह भी कहा जाता है क्योंकि ये किसी ख़ास हित के बजाय सामूहिक हित को बढ़ावा देते हैं।

• इनका लक्ष्य अपने सदस्यों की नहीं बल्कि किन्हीं और की मदद करना होता है ।

• मिसाल के लिए हम बँधुआ मजदूरी के खिलाफ़ लड़ने वाले समूहों का नाम ले सकते हैं । ऐसे समूह अपनी भलाई के लिए नहीं बल्कि बँधुआ मजदूरी के बोझ तले पिस रहे लोगों के लिए लड़ते हैं ।

 

○ आंदोलन समूह

• आंदोलन समूह दो प्रकार के होते हैं : उद्देश्य आधारित आंदोलन और सामान्य आंदोलन जारी करना ।

• अधिकांश आंदोलन इस प्रकार के होते हैं जो एक सीमित समय सीमा के भीतर एक ही उद्देश्य को प्राप्त करना चाहते हैं ।

• उदाहरण : लोकतंत्र के निलंबन के लिए राजा के आदेशों को पलटने के विशिष्ट उद्देश्य के साथ लोकतंत्र के लिए नेपाली आंदोलन की शुरुआत हुई ।

 

 

○ दबाव-समूह और आंदोलन राजनीति पर कैसे असर डालते हैं:-

• दबाव समूह और आंदोलन अपने लक्ष्य तथा गतिविधियों के लिए जनता का समर्थन और सहानुभूति हासिल करने की कोशिश करते हैं।

• ऐसे समय में अक्सर हड़ताल अथवा सरकारी कामकाज में बाधा पहुंचाने जैसे उपायों का सहारा लेते हैं।

• अधिकतर आंदोलनकारी समूह अक्सर युक्तियों का इस्तेमाल करते हैं कि सरकार उनकी मांगों की तरफ ध्यान देने के लिए बाध्य हो।

• दबाव समूह और आंदोलन दलीय राजनीति में सीधे भाग नहीं लेते लेकिन वह राजनीतिक दलों का अचार डालना चाहते हैं।

• कुछ मामलों में दबाव समूह राजनीतिक दलों द्वारा बनाए गए होते हैं अथवा उनका नेटवर्क राजनीतिक दल के नेता करते हैं

• ‘असम आंदोलन ‘ द्वारा असम गण परिषद।

तमिलनाडु में समाज-सुधार आंदोलन – डी.एम.के

 

 

○ दबाव समूह और आंदोलन के सकारात्मक प्रभाव :-

• सरकारें अक्सर अमीर और शक्तिशाली लोगों के . एक छोटे समूह के अनुचित दबाव में आ सकती हैं । जनहित समूह और आंदोलन इस अनुचित प्रभाव का मुकाबला करने और आम नागरिकों की जरूरतों और चिंताओं की सरकार को याद दिलाने में एक उपयोगी भूमिका निभाते हैं ।

 

 

 

अध्याय 6: राजनीतिक दल

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