अध्याय 2 : यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति | Socialism in Europe and the Russian Revolution

Spread the love

यूरोप में समाजवाद , सामाजिक परिवर्तन का युग , रूढ़िवादी , उदारवादी , रैडिकल , , पेत्रोग्राद में फरवरी क्रांति , रूस में समाजवाद , पहला विश्वयुद्ध, रूसी क्रांति और सोवियत संघ का वैश्विक प्रभाव

 

1870 का दशक आते – आते समाजवादी विचार पूरे यूरोप में फैल चुके थे । समाजवादियों ने द्वितीय इंटरनेशनल के नाम से एक अंतरराष्ट्रीय संस्था भी बना ली थी ।

इंग्लैंड और जर्मनी के मजदूरों ने अपनी जीवन और कार्य स्थिति में सुधार लाने के लिए संगठन बनाना शुरू कर दिया था ।

 

 समाजवाद (Socialism) :- एक आर्थिक-सामाजिक दर्शन है। समाजवादी व्यवस्था में धन-सम्पत्ति का स्वामित्व और वितरण समाज के नियन्त्रण के अधीन रहते हैं। आर्थिक, सामाजिक और वैचारिक प्रत्यय के तौर पर समाजवाद निजी सम्पत्ति पर आधारित अधिकारों का विरोध करता है।

 

 

साम्यवाद और समाजवाद क्या है?

समाजवा:- कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स द्वारा प्रतिपादित तथा साम्यवादी घोषणापत्र में वर्णित समाजवाद की चरम परिणति है।

साम्यवाद :- सामाजिक-राजनीतिक दर्शन के अंतर्गत एक ऐसी विचारधारा के रूप में वर्णित है, जिसमें संरचनात्मक स्तर पर एक समतामूलक वर्गविहीन समाज की स्थापना की जाएगी।

 

 ☆ सामाजिक परिवर्तन का युग :- यह दौर गहन सामाजिक और आर्थिक बदलावों का था।

• निजी सम्पति का विरोध।
• सामूहिक समुदायों की रचना ।
• सरकार द्वारा सामूहिक उद्यमों को बढ़ावा।
• सारी सम्पति पर पूरे समाज का नियंत्रण एवं स्वामित्व। • 1870 के दशक आते-आते समाजवादी विचार पूरे यूरोप में फैल चुका था।

 

 

☆ सामाजिक परिवर्तन को मूर्त रूप देने में तीन अलग-अलग विचारधाराओं का विकास हुआ:-

1. उदारवादी :- उदारवाद (Liberalism) वह विचारधारा है जिसके अंतर्गत मनुष्य को विवेकशील प्राणी मानते हुए सामाजिक संस्थाओं को मनुष्यों की सूझबूझ और सामूहिक प्रयास का परिणाम समझा जाता है। उदारवाद की उतपति को 17वी शताब्दी के प्रारंभ से देखा जा सकता हैं। जॉन लॉक को उदारवाद का जनक माना जाता है।

 

उदारवादियों के मुख्य विचार :-
1. सभी धर्मों का आदर एवं सम्मान और जगह मिले।
2. वंश-आधारित शासकों की अनियंत्रित सत्ता के विरोधी।
3. सरकार के समक्ष व्यक्ति मात्र के अधिकारों की रक्षा के पक्षधर।
4.प्रतिनिधि पर आधारित निर्वाचित सरकार और स्वतंत्र न्यायपालिका के पक्ष में थे।
5. सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के स्थान पर संपतिधारकों को वोट के अधिकार के पक्ष में थे।

 

2.रूढ़िवाद:- सामाजिक विज्ञान के अंतर्गत व्यवहृत एक ऐसी विचारधारा है जो पारंपरिक मान्यताओं का अनुकरण तार्किकता या वैज्ञानिकता के स्थान पर केवल आस्था तथा प्रागनुभवों के आधार पर करती है। यह सामाजिक, राजनीतिक और नैतिक मान्यताओं का समुच्चय है जो चिरकाल से प्रचलित मान्यताओं और व्यवस्था के प्रति सम्मान को बढ़ावा देती है।

रूढ़िवादियों के मुख्य विचार :-
1. उदारवादियों और परिवर्तनवादियों का विरोध।
2. रूढ़िवाद परिवर्तन को स्वीकार नही करता।
3. अतीत का सम्मान किया जाए और अतीत को पूरी तरह ठुकराया न जाए।
4. ये चाहते थे कि बदलाव की प्रक्रिया धीरे-धीरे हो।
5. ये सामाजिक संस्थानों को बढ़ावा देने और संरक्षित करने का प्रयास करता है ।

 

3.रेडिकल :- समूह के लोग ऐसी सरकार के पक्ष में थे, जिसे देश की आबादी बहुसंख्यक जनसंख्या का समर्थन मिला हुआ हो। रेडिकल समूह के लोग बड़े-बड़े पूंजीपतियों, जमीदारों, उद्योगपतियों को प्राप्त किसी भी तरह के विशिष्ट अधिकारों के विरुद्ध थे।
 

रेडिकलवादियों के मुख्य विचार :-

1. सरकार आबादी के बहुमत के समर्थन पर आधरित हो।2. बड़े जमीदारों और संपन्न उद्योगपतियों को प्राप्त विशेषाधिकार का विरोध।
3. सम्पति के संकेद्रण का विरोध लेकिन निजी सम्पति का विरोध नही।
4. महिलाओं मताधिकार आंदोलन का समर्थन
5.। यह समानता पर आधारित समाज की स्थापना करना चाहते थे।

 

 औद्योगिक समाज :- यह दौर गहन सामाजिक एवं आर्थिक बदलावों के था।
• जब ने शहर बस रहे थे।
• नए-नए औद्योगिक क्षेत्र विकसित हो रहे थे।
• रेलवे का विस्तार हो चुका था।
• औद्योगिक क्रांति सम्पन्न हो चुकी थी।

 

 

☆ यूरोप में समाजवाद का आना :-

• उन्नीसवीं सदी के मध्य तक यूरोप में समाजवादी विचारधारा आया।

• समाजवादी निजी संपत्ति के विरोधी थे।

• संपत्ति के निजी स्वामित्व की व्यवस्था ही सारी समस्याओं का जड़ है।

• संपत्ति पर किसी एक व्यक्ति के बजाय पूरे समाज के नियंत्रण हो ।

• साझा सामाजिक हितों पर ज्यादा अच्छी तरह ध्यान दिया जा सकता है।

 

● समाजवादी क्या बदलाव चाहते थे।

• कार्ल मार्क्स ( 1818-1882) उनकी प्रारंभिक शिक्षा एक स्थानीय स्कूल जिमनेजियम में पूरी हुई।
बोन विश्वविद्यालय से उन्होंने कानून की शिक्षा प्राप्त की। तत्पश्चात् बर्लिन विश्वविद्यालय से दर्शन एवं इतिहास का अध्ययन किया।

• कार्ल मार्क्स सिद्धांत:-
वर्गसंघर्ष’ का सिद्धांत मार्क्स के ‘वैज्ञानिक समाजवाद’ का मेरूदंड है। इसका विस्तार करते हुए उन्होंने इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या और बेशी मूल्य (सरप्लस वैल्यू) के सिद्धांत की स्थापनाएँ कीं। मार्क्स के सारे आर्थिक और राजनीतिक निष्कर्ष इन्हीं स्थापनाओं पर आधारित हैं।

 

मार्क्स का विचार :-

• औद्योगिक समाज ‘ पूँजीवादी’ समाज है।

• पूंजीपतियों के मुनाफा मजदूरों की मेहनत से पैदा होता है।

• मजदूरों को पूंजीवाद व निजी संपत्ति पर आधारित शासन को उखाड़ फेंकना चाहिए।

• मजदूरों को एक ऐसा समाज बनाना होगा जिसमें सारी संपत्ति पर पूरे समाज का नियंत्रण हो।

• उन्होंने भविष्य के इस समाज को साम्यवादी ( कम्युनिस्ट) समाज का नाम दिया।

 

☆ समाजवाद के लिए समर्थन :- 1870 का दशक आते-आते समाजवादी विचार पूरे यूरोप में फैल चुका था।

• पहली दुनिया :- पूंजीवादी देश के समर्थक।

• दूसरी दुनिया :- समाजवादी देश के समर्थक।

• इंग्लैंड और जर्मनी के मजदूरों ने अपनी जीवन और कार्यस्थितियों में सुधार लाने के लिए संगठन बनाना शुरू कर दिया था।

• संकट के समय मदद और काम के घण्टो में कमी तथा मताधिकार के लिए आवाज उठाना शुरू कर दिया ।

• 1905 तक ब्रिटेन के समाजवादियों और ट्रैड यूनियन आंदोलनकारियों ने लेबर पार्टी के नाम से अपनी एक अलग पार्टी बना ली थी।

 

 ☆ रूसी क्रांति :- फरवरी 1917 में राजशाही के पतन से लेकर अक्टूबर 1917 में रूस की सत्ता पर समाजवादियों के कब्जे तक कि घटनाओं को रूसी क्रांति कहा जाता है।

 

 • रूसी क्रांति के कारण :-

1. निरंकुश राजतंत्र एवं स्वेच्छाचारी शासक।
2. सामाजिक-आर्थिक विषमता।
3. किसानों की दयनीय स्थिति।
4.श्रमिकों की दशा।
5.रूस एवं जापान युद्ध।

 

 

 ☆ वर्ष 1905 की क्रांति :-

1. 20वीं सदी के आरंभ में रूस पर जार निकोलस-II का शासन था। वह एक तानाशाह था, जिसकी नीतियाँ जनता के बीच लोकप्रिय नहीं थीं। जब रूस जापान से हार गया तो वर्ष 1905 में जार का विरोध चरम पर पहुँच गया।

2. 9 जनवरी 1905 को रूसी श्रमिकों का एक जत्था अपने बीबी बच्चों के साथ जार को ज्ञापन सौंपने के लिये निकला, लेकिन सेंट पीटर्सबर्ग में उन पर गोलियाँ बरसा दी गईं। यह घटना इतिहास में ‘ब्लडी सन्डे’ के नाम से जानी जाती है। हज़ारों की संख्या में लोग मारे गए और समूचे रूस में जार के विरुद्ध प्रदर्शन होने लगे।

3.जार निकोलस को समझौता करने के लिये विवश होना पड़ा और अक्तूबर घोषणा-पत्र तैयार किया गया, जिसमें एक निर्वाचित संसद (ड्यूमा) को शामिल करने की भी बात कही गई थी। हालाँकि बाद में जार अक्तूबर घोषणा-पत्र में किये गए वादों से मुकर गया।

4. जहाँ एक ओरजार अपने वादों पर टिका नहीं रह सका, वहीं ड्यूमा भी रूसी जनता की आकांक्षाओं पर खरी नहीं उतर पाई। जनता की परेशानियाँ ज्यों की त्यों बनी रहीं।

5.अतः देर-सबेर दूसरी क्रांति तो होनी ही थी और कुछ इस तरह से वर्ष 1917 की क्रांति की पृष्ठभूमि तैयार हुई।

 

 

☆ अक्तूबर 1917 की रूसी क्रांति:-

1.मार्च 1917 आते-आते जनता की दशा अत्यंत ही दयनीय हो गई थी। उसके पास न पहनने को कपड़े थे और न खाने को अनाज था।

2.परेशान होकर भूखे और ठंड से ठिठुरते हुए गरीब और मज़दूरों ने 7 मार्च को पेट्रोग्रेड की सड़कों पर घूमना आरंभ कर दिया। रोटी की दुकानों पर ताज़ी और गरम रोटियों के ढेर लगे पड़े थे। भूखी जनता अपने आपको नियंत्रण में नहीं रख सकी। उन्होंने बाज़ार में लूट-पाट करनी आरंभ कर दी।

3.सरकार ने सेना को उन पर गोली चलाने का आदेश दिया ताकि गोली चलाकर लूटमार करने वालों को तितर-बितर किया जा सके, किंतु सैनिकों ने गोली चलाने से साफ मना कर दिया क्योंकि उनकी सहानुभूति जनता के प्रति थी।

4.उनमें भी क्रांति की भावना प्रवेश कर चुकी थी। जार को अपना अंत नज़दीक नज़र आने लगा। ड्यूमा ने सलाह दी कि जनतांत्रिक राजतंत्र की स्थापना की जाए, लेकिन जार इसके लिये तैयार नहीं हुआ और इस तरह से रूस से राजतंत्र का खात्मा हो गया।

5.उपरोक्त निर्णय रूस में भी पश्चिमी राज्यों की तरह प्रजातांत्रिक व पूंजीवादी शासन के संकेत दे रहे थे जबकि रूस की क्रांति मज़दूरों, कृषकों, सैनिकों द्वारा प्राप्त की गई थी।
बोल्शेविक के नेतृत्त्व में इस सरकार का विरोध किया गया।

6. मज़दूर और सैनिकों ने मिलकर सोवियत का गठन किया। इस सोवियत ने ड्यूमा के साथ मिलकर अस्थायी सरकार का गठन किया तथा इसका प्रमुख करेंसकी बना जो मध्यवर्गीय हितों से परिचालित था।

 

 

☆ रूसी क्रांति का परिणाम :-

1. राजनीतिक परिणाम :-

• राजतंत्र समाप्त हुआ, सर्वहारा का शासन स्थापित हो गया।

• रूस द्वारा पूंजीवाद व उपनिवेशवाद के स्वाभाविक विरोध के कारण उसे औपनिवेशक शोषण से मुक्ति का अग्रदूत समझा गया।

• जर्मनी के साथ बेस्टलिटोवस्क की संधि द्वारा प्रथम विश्वयुद्ध से रूस अलग हो गया।

 

2. आर्थिक परिणाम :-

• रूस में उत्पादन एवं वितरण के साधनों पर राज्य का नियंत्रण स्थापित।

• चूँकि पूंजीवादी देशों से रूस को किसी प्रकार के सहयोग की अपेक्षा नहीं थी, अत: वह वैज्ञानिक-तकनीकी विकास हेतु आत्मनिर्भरता के पथ पर अग्रसर हुआ।

• रूस द्वारा नियोजित अर्थव्यवस्था के माध्यम से आर्थिक विकास करने के कारण वह वैश्विक आर्थिक मंदी से दुष्प्रभावित नहीं हुआ।

 

3. सामाजिक परिणाम :-

• सामंत व कुलीन वर्ग की समाप्ति।

• चर्च के शासन की समाप्ति।

• वर्ग भेद की समाप्ति।

• रूस में शिक्षा का प्रसार, राज्य द्वारा 16 वर्ष की उम्र तक नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान।

• लैंगिक भेदभाव की समाप्ति।

 

 

☆ रूस में समाजवाद :-

• 1914 से पहले रूस में सभी राजनीतिक पार्टियां गैरकानूनी थी।

• मार्क्स के विचारों को मानने वाले समाजवादियों ने 1898 में रशियन सोशल डेमोक्रेटिक वर्क्स पार्टी का गठन किया।

• यह एक रूसी समाजिक लोकतांत्रिक श्रमिक पार्टी थी।

• 19 वी सदी के आखिर में रूस के ग्रामीण इलाकों में समाजवादी काफी सक्रिय थे ।

• सन 1900 में उन्होंने सोशलिस्ट रेवलूशनरी पार्टी (समाजवादी क्रांतिकारी पार्टी ) का गठन कर लिया।

• इस पार्टी ने किसानों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया और मांग की सामंतो के कब्जे वाली जमीन तुरंत किसानों को सौंप दी जाए।

 

 

☆1905 की क्रांति :- क्रांति की शुरुआत इसी घटना से हुई।

• सारे देश में हड़ताल होने लगी।

• विश्वविद्यालय बंद कर दिए गए।

• वकीलों , डॉक्टरों , इंजीनियरों और अन्य मध्यवर्गीय कामगारों में संविधान सभा के गठन की माँग करते हुए यूनियन ऑफ यूनियन की स्थापना कर ली।

• जार एक निर्वाचित परामर्शदाता संसद ( ड्यूमा ) के गठन पर सहमत हुआ।

• मात्र 75 दिनों के भीतर पहली ड्यूमा , 3 महीने के भीतर दूसरी ड्यूमा को उसने बर्खास्त कर दिया।

• तीसरे ड्यूमा में उसने रूढ़िवादी राजनेताओं को भर दिया ताकि उसकी शक्तियों पर अंकुश न लगें।

 

☆ रूसी समाज :-

• रूस में लगभग 85% जनता खेती पर निर्भर है।

• कारखाने उद्योगपतियों की निजी संपत्ति थे जहाँ काम की दशाएँ बेहद खराब थी।

• रूस में एक निरंकुश राजशाही था।

• 1904 ई.में जरूरी चीजों की कीमतें तेजी से बढ़ने लगी।

• मजदूर संगठन अपनी स्थिति में सुधार की माँग करने लगे।

 

 

☆पहला विश्वयुद्ध और रूसी साम्राज्य :-

• प्रथम विश्वयुद्ध 1914-1918

◆ प्रथम विश्वयुद्ध क्यो हुआ
प्रथम विश्व युद्ध के लिए यूं तो 28 जून 1914 को ऑस्ट्रिया-हंगरी साम्राज्य के उत्तराधिकारी आर्चड्युक फर्डिनेंड की हत्या को प्रमुख और तात्कालिक कारण माना जाता है, लेकिन इतने बड़े युद्ध के लिए सिर्फ यही वजह नहीं थी बल्कि इसके कई और घटनाक्रम थे, जो विश्व युद्ध के लिए जिम्मेदार थे।

 

◆ प्रथम विश्व युद्ध में कौन कौन से देश शामिल थे?

केंद्रीय शक्तियाँ :- जर्मनी , ऑस्ट्रिया , तुर्की , हंगरी , बुल्गारिया

मित्र राष्ट्र :- फ़्रांस , ब्रिटेन , रूस , इटली , रूमानिया।

 

◆ प्रथम विश्व युद्ध कब हुआ

28 जुलाई 1914 – 11 नवंबर 1918

 

● फरवरी क्रांति के कारण :-

• प्रथम विश्व युद्ध को लंबा खींचना।
• सैनिकों का मनोबल गिरना।
• शरणार्थियों की समस्या।
• खाद्यान्न की कमी उद्योगों का बंद होना।
• असंख्य रूसी सैनिकों की मौत।

 

● फरवरी क्रांति के प्रभाव :-

• रूस में जारशाही का अंत।
• सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर संविधान सभा का चुनाव।
• अंतरिम सरकार में सोवियत और ड्यूमा के नेताओं की शिरकत।

 

■ अप्रैल थिमिस:- महान बोल्शेविक नेता लेनिन ने तीन मांगें रखी जिसे थिमिस कहा गया

• युद्ध की समाप्ति
• बैंको का राष्ट्रीयकरण
• सारी जमीने किसानों के हवाले

 

◆ बोल्शेविक क्रांति क्या है :-रूस में 1917 में हुई क्रांति को ही बोल्शेविक क्रांति कहा जाता है, क्योंकि बोल्शेविक नामक राजनीतिक समूह ने इस क्रांति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और क्रांति की दशा एवं दिशा निर्धारित की थी।

 

◆ अक्टूबर क्रांति क्या है :- फरवरी 1917 में राजशाही के पतन और 1917 के ही अक्टूबर के मिश्रित घटनाओं को अक्टूबर क्रांति कहा जाता है।

 

 

● अक्टूबर क्रांति के बाद क्या बदला :-
• निजी सम्पति का खात्मा
• बैंको एवं उद्योगों का राष्ट्रीयकरण
• जमीनों को सामाजिक सम्पति घोषित करना
• रूस एक दलीय व्यवस्था वाला देश बन गया
• गृह युद्ध का आरंभ

 

 

◆ यूरोप में समाजवाद का उदय कब हुआ?

एक राजनीतिक विचारधारा के रूप में समाजवाद युरोप में अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी में उभरे उद्योगीकरण की अन्योन्यक्रिया में विकसित हुआ है।

 

◆ यूरोप में समाजवाद कैसे आया ?

1870 का दशक आते – आते समाजवादी विचार पूरे यूरोप में फैल चुके थे ।

दूसरी दुनिया :- समाजवादी देश के समर्थक

 

◆ विश्व का पहला समाजवादी देश कौन था?

रूस पहला देश है जहां समाजवाद का गठन किया गया था।

 

◆ 1917 में रूस का सम्राट कौन था?
रूसी क्रांति के दौरान रोमनोव्ह राजवंश के ज़ार निकोलस II रूसी साम्राज्य के शासक थे।

 

बोल्शेविक क्रांति का प्रमुख नेता कौन था?

रूसी क्रांति का जनक लेनिन को कहा जाता है जिन्होंने रूस की क्रांति में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

 

 

◆ रूसी क्रांति कब हुई थी?

रूसी क्रांति 1917 में शुरू हुई और 1923 में समाप्त हुई।

•पूर्वी यूरोप और उत्तरी एशिया में फैला देश रूस पहले यूनियन ऑफ सोवियत सोशलिस्ट रिपब्लिक (USSR) का प्रमुख गणराज्य था।

• इसे आमतौर पर सोवियत संघ के रूप में जाना जाता है।

• 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस एक स्वतंत्र देश बन गया।

 

 

 ◆ सोवियत संघ ( रूस)

• रूस में 1917 में समाजवादी क्रान्ति हुई ।

• समाजवाद के आदर्शों और समतामूलक समाज की जरूरत से प्रेरित थी।

• यह क्रांति पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ थी.

• इस क्रांति के बाद सोवियत संघ (USSR) अस्तित्व में आया.

• समाजवादी खेमे के देश ‘ दूसरी दुनिया ‘ कहा जाता है।

• सोवियत राजनीतिक प्रणाली की धुरी कम्युनिस्ट पार्टी थी।

• अर्थव्यवस्था योजनाबद्ध और राज्य के नियंत्रण में थी।

सोवियत संघ 15 गणराज्य को मिलाकर बना था.

1) रूस
2) यूक्रेन
3) जॉर्जिया
4) बेलारूस
5) उज़्बेकिस्तान
6) आर्मेनिया
7) अज़रबैजान
8) कजाकिस्तान
9) किरतिस्थान
10) माल्डोवा
11) तुर्कमेनिस्तान
12) ताजीकिस्तान
13) लताविया
14) लिथुनिया
15) एस्तोनिया

 रूस को सोवियत संघ का उत्तराधिकारी बनाया गया ।

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.