बिहार में स्थित अशोक के स्तंभलेख | BIHAR GK

Spread the love

 बिहार में स्थित अशोक के स्तंभलेख

• लौरिया नंदनगढ़ स्तंभलेख चंपारण (बिहार) में इस स्तंभ पर मोर का चित्र बना हुआ है। लौरिया-अरेराज स्तंभलेख चंपारण (बिहार)।
• रामपुरवा स्तंभलेख चंपारण (बिहार) में स्थित इस स्तंभलेख की खोज 1872 ई. में करलायल ने की।

❍ मौर्य प्रशासन ने सम्बन्धित प्रमुख तथ्य

• मौर्यकाल में भू-स्वामी को क्षेत्रक तथा काश्तकार को उपवास कहा जाता था।

• मौर्य प्रशासन में राजस्व को राष्ट्र के नाम से जाना जाता था।

• मौर्यकाल में बलि एक प्रकार का भू-राजस्व था, जबकि हिरण्य नामक कर अनाज के रूप में न होकर नकद लिया जाता था।

• मौर्यकाल में ब्रिकी कर के रूप में मूल्य का 10वाँ भाग वसूला जाता था। इसे बचाने वाले को मृत्युदण्ड दिया जाता था।

• मौर्य वंश चन्द्रगुप्त मौर्य व बिन्दुसार के समय में 5 प्रान्तों में विभाजित था। उत्तरापथ की राजधानी तक्षशिला, अवन्ति की राजधानी उज्जैनी, दक्षिणापथ की राजधानी स्वर्णगिरि, प्राची की राजधानी पाटलिपुत्र व कलिंग की राजधानी तोसली थी।

 

❍ मौर्य कला एवं शिक्षा

• मौर्यकाल की प्रमुख मूर्तियाँ दक्षिणी दीदारगंज से, यक्ष मथुरा से, माणभद्र यक्ष ग्वालियर से और दो मूर्तियाँ बेसनगर से प्राप्त हुई हैं।

• मौर्यकाल में तक्षशिला शिक्षा का प्रसिद्ध केन्द्र था। मौर्यकाल में चाँदी की आहत मुद्राएँ प्रचलित थीं।

 

♢ मौर्योत्तर काल में बिहार

मौर्य साम्राज्य के पतन के पश्चात् मगध एवं बिहार क्षेत्र में शुंग, कण्व व कुषाण वंश की स्थापना हुई, जिनका विवरण निम्न प्रकार है

❍ शुंग वंश

• पुष्यमित्र शुंग ने मौर्य वंश के अन्तिम शासक वृहद्रथ की हत्या करके 185 ई. पू. में शुंग राजवंश की स्थापना की।

• शुंगकाल में इसकी राजधानी पाटलिपुत्र थी, लेकिन कालान्तर में विदिशा ने इसका स्थान लिया।

• शुंग वंश के शासनकाल में ही 185 ई. पू. में डेमेट्रियस का आक्रमण पाटलिपुत्र पर हुआ था।

• पुष्यमित्र शुंग ने दो अश्वमेघ यज्ञों का आयोजन किया था, जिसमें पुरोहित पतंजलि थे। इन अश्वमेध यज्ञों की चर्चा धनदेव के अयोध्या अभिलेख में की गई है।

• पुष्यमित्र शुंग ने बड़ी संख्या में बौद्ध भिक्षुओं की हत्या कराकर बौद्ध स्तूपों और विहारों को नष्ट कर दिया था।

• पुष्यमित्र शुंग की मृत्यु 148 ई. पू. में हो गई, जिसके बाद उसका पुत्र अग्निमित्र शुंग वंश का राजा बना।

• अग्निमित्र ने विदिशा को जीतकर अपने साम्राज्य में शामिल किया।

• अग्निमित्र ही कालिदास के प्रसिद्ध नाटक मालविकाग्निमित्रम् का नायक है।

• इस वंश का अन्तिम शासक देवभूति था।

 

❍ कण्व वंश

• शुंग वंश के अन्तिम शासक देवभूति की हत्या करके उसके अमात्य वसुदेव ने 72 ई. पू. में कण्व राजवंश की नींव डाली।

• वसुदेव के पश्चात् भूमिदेव, नारायण तथा सुशर्मा शासक बने।

• सुशर्मा इस वंश का अन्तिम शासक था।
• कण्व राजवंश ब्राह्मण जाति से सम्बन्ध रखता था तथा इस वंश के अन्तिम शासक सुशर्मा की हत्या आन्ध्रजातीय शासक सिमुक ने की।

❍ कुषाण वंश

• इस वंश की स्थापना कुजुल कडफिसस द्वारा 75 ई. में की गई।

• इस वंश का प्रसिद्ध शासक कनिष्क था।

• कनिष्क ने अपना साम्राज्य विस्तार मगध क्षेत्र तक किया।

• चतुर्थ बौद्ध संगीति का आयोजन इसी के काल में कुण्डलवन में हुआ था।

 

♢ गुप्तकाल व बिहार

• भारतीय इतिहास में गुप्तकाल को ‘स्वर्ण युग’ के नाम से जाना जाता है।

• इस वंश का उदय सम्भवतः आधुनिक उत्तर प्रदेश के पूर्वी भाग में इलाहाबाद (प्रयागराज) और बनारस के मध्य क्षेत्र में हुआ। गुप्त वंश में निम्न राजाओं ने शासन किया, जिनका वर्णन इस प्रकार है

 

∆ श्रीगुप्त

• गुप्त वंश की स्थापना 240 ई. में श्रीगुप्त ने की थी। श्रीगुप्त ने अयोध्या, प्रयाग एवं सारनाथ क्षेत्र में 240 से 280 ई. तक शासन किया। श्रीगुप्त के पश्चात् 280 से 320 ई. तक इसके पुत्र घटोत्कच ने शासन किया।

∆ चन्द्रगुप्त प्रथम

• चन्द्रगुप्त प्रथम (319-335 ई.) घटोत्कच का पुत्र था। इसे गुप्त वंश का वास्तविक संस्थापक माना जाता है, जिसका राज्यारोहण 320 ई. में हुआ था। इसने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की।

• चन्द्रगुप्त प्रथम की राजधानी पाटलिपुत्र थी। उसने लिच्छवियों का सहयोग एवं समर्थन पाने के लिए लिच्छवि की राजकुमारी कुमारदेवी से विवाह किया।

• गुप्तवंश में सर्वप्रथम चन्द्रगुप्त प्रथम ने ही सोने के सिक्के चलाए थे।

• चन्द्रगुप्त प्रथम ने अपने राज्यारोहण (319-320 ई.) में एक सम्वत् की शुरुआत की, जिसे गुप्त सम्वत् कहते हैं।

 

∆ समुद्रगुप्त

• चन्द्रगुप्त प्रथम के पश्चात् उसका पुत्र समुद्रगुप्त मगध के सिंहासन पर बैठा।

• समुद्रगुप्त को इतिहासकार वी. ए. स्मिथ ने भारतीय नेपोलियन की संज्ञा दी है। इसे कविराज भी कहा जाता था।

• समुद्रगुप्त के विजय अभियानों की जानकारी हरिषेण द्वारा रचित प्रयाग प्रशस्ति में मिलती है।

∆ चन्द्रगुप्त द्वितीय

• समुद्रगुप्त के पश्चात् गुप्त वंशावली में चन्द्रगुप्त द्वितीय का नाम उल्लेखित है।

• चन्द्रगुप्त द्वितीय ने 389 ई. में शकराज रुद्रसिंह पर विजय प्राप्त करने के उपरान्त विक्रमादित्य की उपाधि धारण की।

• चीनी यात्री फाह्यान का भारत में आगमन चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल में ही हुआ।

• उसने बिहार क्षेत्र का भ्रमण किया तथा 3 वर्षों तक पाटलिपुत्र में रहा।

∆ कुमारगुप्त प्रथम

• चन्द्रगुप्त द्वितीय के पश्चात् उसका पुत्र कुमारगुप्त प्रथम गद्दी पर बैठा।

• नालन्दा महाविहार की स्थापना कुमारगुप्त प्रथम ने की थी। इसने 40 वर्षों तक शासन किया तथा गुप्त साम्राज्य को संगठित एवं सुशासित किया।

∆ स्कन्दगुप्त

• कुमारगुप्त प्रथम के निधन के पश्चात् 455 ई. में उसका सुयोग्य पुत्र स्कन्दगुप्त उत्तराधिकारी हुआ।

• स्कन्दगुप्त के शासनकाल में ही हूणों का आक्रमण शुरू हो गया था।

• स्कन्दगुप्त के जूनागढ़ अभिलेख के अनुसार, स्कन्दगुप्त ने हूणों को पराजित किया और उन्हें देश से बाहर खदेड़ दिया।

 

♢ गुप्तोत्तर काल में बिहार

• इस काल में गौड़ शासक शशांक ने बिहार के विस्तृत क्षेत्र पर अधिकार कर लिया था।

• शशांक ने बौद्धों के धार्मिक स्थलों को नष्ट करने के साथ-साथ बोधगया स्थित महाबोधि वृक्ष को भी क्षति पहुँचाई।

• सातवीं शताब्दी ईसा के आरम्भ में हर्षवर्द्धन ने बिहार के कुछ भागों पर अपना नियन्त्रण स्थापित किया तथा माधवगुप्त को मगध में अपना प्रतिनिधि नियुक्त किया।

• चीनी यात्री ह्वेनसांग हर्ष के शासनकाल में भारत आया था। उसने 6 वर्षों तक नालन्दा विश्वविद्यालय में अध्ययन किया।

• 635 ई. में ह्वेनसांग पाटलिपुत्र आया था। उसने इस महानगर के वैभव को समाप्त प्राय देखा।

• इत्सिंग एक चीनी यात्री और बौद्ध भिक्षु था, जो 675 ई. में भारत आया था। इत्सिंग 10 वर्षों तक नालन्दा विश्वविद्यालय में रहा।

 

 

♢ प्राचीन काल के व्यक्तित्व प्रमुख
प्राचीन काल के प्रमुख व्यक्तित्वों का वर्णन निम्न है

❍ महावीर स्वामी

• महावीर का जन्म 540 ई. पू. में वैशाली के समीप कुण्डग्राम में हुआ था। महावीर जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर थे। इनके बचपन का नाम वर्द्धमान था।

• इन्हें 12 वर्ष की कठोर साधना के पश्चात् ऋजुपालिका नदी के तट पर जृम्भिक ग्राम में साल वृक्ष के नीचे कैवल्य प्राप्त हुआ। महावीर ने 468 ई. पू. में पावापुरी में शरीर त्याग दिया था।

• इनके प्रमुख उपदेश अहिंसा सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य थे।

• बौद्ध ग्रन्थ मृज्झिम निकाय के ‘समागम सुत्त’ खण्ड में महावीर स्वामी की चर्चा ‘निग्रंथ नाथपुत’ के रूप में की गई है।

❍ महात्मा बुद्ध

• महात्मा बुद्ध का जन्म 563 ई. पू. कपिलवस्तु के शाक्य कुल के क्षत्रिय परिवार में हुआ था। इन्हें बोधगया में निरंजना नदी (फल्गु नदी) के तट पर ज्ञान प्राप्त हुआ। इन्होंने चार आर्य सत्य एवं आष्टांगिक मार्ग का प्रतिपादन किया।

• इनको 483 ई.पू. में कुशीनगर (उत्तर प्रदेश) में महापरिनिर्वाण प्राप्त हुआ। मगध के शासक बिम्बिसार ने भगवान बुद्ध से दीक्षा ली थी। महात्मा बुद्ध मध्यम मार्ग के पक्षकार थे।

 

❍ आर्यभट्ट

• आर्यभट्ट का जन्म पाटलिपुत्र (प्राचीन कुसुमपुर) में हुआ था। इस महान् गणितज्ञ ने बीजगणित की प्रारम्भिक आधारशिला रखी। इन्होंने दशमलव प्रणाली का विकास किया।

• ये गणितज्ञ होने के साथ-साथ खगोलविद् भी थे। आर्यभट्ट ऐसे प्रथम नक्षत्र वैज्ञानिक थे, जिन्होंने यह बताया कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती हुई सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है।

• इनके द्वारा रचित पुस्तकों में आर्यभट्टीय एवं सूर्य सिद्धान्त महत्त्वपूर्ण हैं।

 

❍ सम्राट अशोक

• अशोक अपने पिता बिन्दुसार के बाद मगध की गद्दी पर बैठा। 261 ई. पू. में हुए कलिंग युद्ध ने इसके हृदय को परिवर्तित कर दिया एवं इसने बौद्ध धर्म को स्वीकार कर लिया।

• प्रजा के कल्याण के लिए उसने बड़े पैमाने पर कार्य करवाए एवं भेरी घोष के स्थान पर ‘धम्म घोष’ को प्रश्रय दिया। इसी के समय पाटलिपुत्र में तृतीय बौद्ध संगीति का आयोजन 250 ई. पू. में हुआ था।

 

❍ चाणक्य

• इन्हें कौटिल्य एवं विष्णु गुप्त के नाम से भी जाना जाता है। ये चन्द्रगुप्त मौर्य के प्रधानमन्त्री होने के साथ-साथ उनके राजनीतिक गुरु एवं पथ प्रदर्शक भी थे।

• चाणक्य ने अर्थशास्त्र नामक ग्रन्थ की रचना संस्कृत में की, जिसमें मौर्य प्रशासन का विस्तृत वर्णन किया गया है। अर्थशास्त्र एक राजनीतिक व्यवस्था पर लिखी गई पुस्तक थी। इन्होंने नन्द वंश के पतन में अहम योगदान निभाया था।

 

❍ पाणिनि

• वैयाकरण (व्याकरण के ज्ञाता) व्याकरण शास्त्री पाणिनि बिहार के मनेर के निवासी थे। कई विद्वानों में इनके जन्म स्थान को लेकर विवाद है।

• इन्होंने अष्टाध्यायी नामक पुस्तक की रचना की। ये मौर्यकालीन रचनाकार थे।

 

❍ अश्वघोष

• बौद्ध धर्म की महायान शाखा के उत्कृष्ट विद्वान् अश्वघोष ने पाटलिपुत्र के अशोकराम विहार में बौद्ध धर्म की दीक्षा ली।

• कनिष्क ने पाटलिपुत्र पर आक्रमण किया तथा अश्वघोष को बलात् अपने साथ राजधानी पेशावर ले गया।

• इन्होंने बुद्ध चरितम, सौन्दरानन्द, महायान श्रद्धोत्पाद संग्रह, शारिपुत्रप्रकरणम् इत्यादि ग्रन्थों की रचना की।

❍ बुद्धघोष

• आचार्य बुद्धघोष एक बौद्ध भिक्षु थे। इनका जन्म बोधगया के समीप मोरण्ड खेटक नामक गाँव में हुआ था।

• यह अट्ठकथाओं के लिए श्रीलंका गए थे। इनकी प्रसिद्ध पुस्तकें ज्ञानोदय, विसुद्विमग्न, समन्तपासदिका, सुमंगल विलासिनी, मनोरथपूर्ण, अट्ठसालिनी, सम्मोहविनोदनी, परमत्थ-दीपनी इत्यादि हैं।

 

❍ शान्त रक्षित

• इन्होंने बौद्ध धर्म के गौरव को संसार के समक्ष उपस्थित किया। ये आठवीं शताब्दी में पाल वंश के शासनकाल में नालन्दा महाविहार के आचार्य थे। इन्होंने तिब्बत जाकर बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में अपना अमूल्य योगदान दिया।

 

❍ मण्डन मिश्र

• मिथिला के प्रसिद्ध विद्वान् एवं दार्शनिक मण्डन मिश्र शंकराचार्य के समकालीन थे। जनश्रुतियों के अनुसार, शास्त्रार्थ में ये शंकराचार्य के द्वारा पराजित हुए थे, लेकिन इनकी पत्नी ‘भारती’ ने शंकराचार्य को पराजित कर दिया था। इन्होंने न्याय, मीमांसा तथा वेदान्त दर्शन की समृद्धि एवं प्रचार प्रसार में सराहनीय योगदान दिया।

 

❍ आम्रपाली

• आम्रपाली वैशाली की राजनर्तकी थीं। इन्हें वैशाली की नगरवधू का पद प्रदान किया गया।

• इन्होंने भगवान बुद्ध के वैशाली आगमन पर अपने यहाँ भोजन के लिए आमन्त्रित किया, जिसे बुद्ध ने स्वीकार किया।

• अजातशत्रु भी आम्रपाली के प्रशंसकों में शामिल था। बुद्ध ने आम्रपाली को ‘आर्य अम्बा’ कहकर सम्बोधित किया था।

❍ याज्ञवल्क्य

• ये एक ऋषि एवं तपस्वी थे। इन्हें राजा जनक की राजसभा में मुख्य दार्शनिक एवं परामर्शदाता के रूप में रहने का अवसर मिला था।

• याज्ञवल्क्य ने अनेक ग्रन्थों की रचना की, जिसमें याज्ञवल्क्य स्मृति, वृहदारण्यक तथा शतपथ ब्राह्मण आदि ग्रन्थ शामिल हैं।

❍ सारिपुत्र

• सारिपुत्र का जन्म नालन्दा के पास वर्तमान सारि चक्र (प्राचीन नालक ग्राम) में ब्राह्मण कुल में हुआ था।

• ये ब्राह्मण धर्म और दर्शन के प्रकाण्ड पण्डित थे। बाद में इन्होंने बौद्ध धर्म में दीक्षा ली।

• इनके प्रयास से अनेक बार बौद्ध संघ को फूट से बचाया गया। इनकी अस्थियाँ साँची स्तूप से प्राप्त हुई हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published.