अध्याय : 2 क्या हमारे आस-पास के पदार्थ शुद्ध है

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पदार्थ :-

एक प्रकार का द्रव्य है जो कि भौतिक प्रक्रमों द्वारा अन्य प्रकार के द्रव्य में पृथक नहीं किया जा सकता है । एक शुद्ध पदार्थ एक ही प्रकार के कणों का बना होता है ।

 

मिश्रण :-

मिश्रण एक पदार्थ है जो दो या अधिक तत्वों अथवा यौगिकों का , ( रासायनिक रूप से संयुक्त हुए बिना ) बना होता है । उदाहरण :- वायु

मिश्रण के प्रकार :- मिश्रण दो प्रकार के होते हैं । समांगी मिश्रण विषमांगी मिश्रण

 

संमागी मिश्रण :-

वे मिश्रण जिनमें पदार्थ परस्पर पूर्ण रूप से मिश्रित होते हैं और एक दूसरे से अविभेद्य होते हैं , संमागी मिश्रण कहलाते हैं ।

सम्पूर्ण द्रव्यमान में एक समान संघटन होता है ।

उदाहरण :- जल में शर्करा और ( चीनी ) का विलयन संमागी मिश्रण है ।

 

विषमांगी मिश्रण :-

वे मिश्रण जिसमें पदार्थ पृथक रहते हैं और एक पदार्थ छोटे कणों , छोटी – छोटी बूँदों अथवा बुलबुले के रूप में , दूसरे पदार्थ में हर जगह फैला रहता है , विषमांगी मिश्रण कहलाते हैं ।

विषमांगी मिश्रण में , उसके पूरे द्रव्यमान में एक – सा संघटन नहीं होता है ।

उदाहरण :-

शक्कर ( चीनी ) और बालू ( रेत ) का मिश्रण एक विषमांगी मिश्रण है क्योंकि इस मिश्रण के विभिन्न भागों में शक्कर और बालू का भिन्न – भिन्न मिश्रण संघटक होगा । द्रवों में ठोसों के निलम्बन ( Suspension ) भी विषमांगी मिश्रण है ।

 

विलयन :-

विलयन दो या दो से अधिक पदार्थों का समांगी मिश्रण है ।

उदाहरण :- नींबू जल , सोड़ा जल आदि विलयन के उदाहरण हैं ।

विलयन के प्रकार :- किसी विलयन को दो भागों विलायक और विलेय में बाँटा जाता है ।

विलायक :- विलयन का वह घटक जो अधिक मात्रा में उपस्थित होता है , विलायक कहलाता है ।

विलेय :- विलयन का वह घटक जो कम मात्रा में उपस्थित होता है विलेय कहलाता है ।

 

 

विलयन के गुण :-

विलयन एक समांगी मिश्रण है । विलयन के कण व्यास में 1nm से भी छोटे होते हैं । इसलिए वे आँख से नहीं देखे जा सकते हैं । अपने छोटे आकार के कारण विलयन के कण , गुजर रही प्रकाश की किरण को फैलाते नहीं हैं । इसलिए विलयन में प्रकाश का मार्ग दिखाई नहीं देता । छानने की विधि द्वारा विलेय के कणों को विलयन में से पृथक् नहीं किया जा सकता है । विलयन को शांत छोड़ देने पर भी विलेय के कण नीचे नहीं बैठते हैं , अर्थात् विलयन स्थाई है ।

 

 

विलयन की सान्द्रता :-

किसी विलयन के प्रति लीटर आयतन में घुले विलेय पदार्थ की मात्रा को ही विलयन की सान्द्रता कहते हैं ।

संतृप्त विलयन :-

दिए गए निश्चित तापमान पर यदि विलयन में विलेय पदार्थ नहीं घुलता है तो उसे संतृप्त विलयन कहते हैं ।

असंतृप्त विलयन :-

यदि एक विलयन में विलेय पदार्थ की मात्रा संतृप्तता से कम है तो इसे असंतृप्त विलयन कहा जाता है ।

अतिसंतृप्त विलयन :-

यदि विलयन में विलेय पदार्थ की सान्द्रता , संतृप्त स्तर से अधिक हो तो उसे अतिसंतृप्त विलयन कहते हैं ।

 

 

निलम्बन :-

निलम्बन एक विषमांगी मिश्रण है जिसमें विलेय पदार्थ के कण घुलते नहीं , अपितु माध्यम की समष्टि में निलम्बित रहते हैं । ये निलम्बित कण आँखों से देखे जा सकते हैं ; जैसे- आटा जल मिश्रण , बालु जल आदि ।

 

निलंबन के गुणधर्म :-

यह एक विषमांगी मिश्रण है । ये कण आँखों से देखे जा सकते हैं । ये निलंबित कण प्रकाश की किरण को फैला देते हैं , जिससे उसका मार्ग दृष्टिगोचर हो जाता है । जब इसे शांत छोड़ देते हैं तब ये कण नीचे की ओर बैठ जाते हैं अर्थात निलंबन अस्थायी होता है । छानन विधि द्वारा इन कणों को मिश्रण से पृथक् किया जा सकता है ।

 

कोलॉइड :-

वह विलयन जिसमें कणों का आकार 1nm से 1000nm के बीच हो , कोलॉइड कैहलाता है ।

जैसे :- स्टार्च विलयन , दूध , रक्त आदि ।

कोलाइड के गुणधर्म :-

यह एक विषमांगी मिश्रण है । कोलाइड के कणों का आकार इतना छोटा होता है कि ये पृथक् रूप में आँखों से नहीं देखे जा सकते हैं । जब इनको शांत छोड़ दिया जाता है तब ये कण तल पर बैठते हैं अर्थात् ये स्थायी होते हैं । ये छानन विधि द्वारा मिश्रण से पृथक् नहीं किए जा सकते । किंतु एक विशेष विधि अपकेंद्रीकरण तकनीक द्वारा पथक् किए जा सकते हैं । ये इतने बड़े होते हैं कि प्रकाश की किरण को फैलाते हैं तथा उसके मार्ग को दृश्य बनाते हैं ।

 

 

टिण्डल प्रभाव :-

कोलॉइडी कणों द्वारा प्रकाश की किरणों का फैलना टिण्डल प्रभाव कहलाता है ।

 

 

मिश्रण को पृथक करने के तरीके :-

1. वाष्पीकरण :-

मूल उद्देश्य :- मिश्रण के दो पदार्थों में से एक पदार्थ का वाष्पीकरण होना ( जैसे एक पदार्थ का क्वंथनांक दूसरे से कम होता है ।

 

2. अपकेन्द्रीकरण :-

मूल उद्देश्य ( सिद्धान्त ) :- कणों या पदार्थों के घनत्व के कारण पृथक्करण जब किसी पदार्थ को तेजी से घुमाया जाता है तो ( denser particle ) भारी कण नीचे की तरफ दबाव डालते हैं तथा हल्के कण ऊपर चले जाते हैं ।

 

3. पृथक्करण कीप :-

मूल सिद्धान्त :- दो अघुलनशील द्रव ( जो दोनों एक साथ नहीं घुल सकते ) को आसानी से पृथक्करण कीप द्वारा अलग कर सकते हैं । में पृथक्कारी कीप का स्टॉप कार्क खोलने से पानी दूसरे बीकर में इकट्ठा कर सकते हैं तथा दूसरे बीकर में बचा तेल इकट्ठा कर सकते हैं ।

 

4. उर्ध्वपातन विधि :-

मूल सिद्धान्त :- दो पदार्थों के बीच एक पदार्थ उर्ध्वपातित हो जाता है ( सीधे ठोस से गैस में परिवर्तित हो जाना ) जबकि दूसरा ऐसे ही रहता है 

 

5. क्रोमेटोग्राफी :-

मूल सिद्धान्त :- किसी मिश्रण में रंगीन यौगिक , रंजित कणों को पृथक कर सकते हैं । किसी सोखने वाले फिल्टर पेपर की सहायता से जब पानी ( या किसी भी विलयन ) के कण ऊपर की ओर दो अलग – अलग रंग के साथ जाते हैं तो क्रोमेटोग्राफी पेपर द्वारा दोनों पृथक हो जाते हैं । क्योंकि दोनों रंग अलग – अलग गति से सोख लिये जाते हैं ।

 

6. आसवन विधि :-

मूल सिद्धान्त :- दो संघटकों के बीच एक का क्वथनांक दूसरे से कम होता है । यह विधि दो या दो से अधिक घुलनशील द्रवों को अलग करने के लिए किया जाता है ।

 

7. क्रिस्टलीकरण :-

मूल सिद्धान्त :- किसी मिश्रण से अशुद्धियों को दूर करने के लिए पहले किसी उपयुक्त विलयन में घोलना और क्रिस्टलीकरण द्वारा एक संघटक को पृथक करना ।

 

भौतिक परिवर्तन :-

वह परिवर्तन जिसमें पदार्थ की अवस्थाओं का अन्तः रूपान्तरण तो होता है , परन्तु पदार्थ के संघटन तथा रासायनिक प्रकृति में कोई परिवर्तन नहीं होता , भौतिक परिवर्तन कहलाता है ।

जैसे :- जल का नमक में घुलना , बल्ब जलना , मोम का पिघलना आदि ।

 

रासायनिक परिवर्तन :-

वे परिवर्तन जिनमें एक या अधिक पदार्थ , किसी अन्य पदार्थ में परिवर्तित हो जाते हैं , रासायनिक परिवर्तन कहलाता है ।

जैसे :- लोहे पर जंग लगना , कार्बन का जलकर कार्बन डाइऑक्साइड बनाना ।

 

 

तत्व :-

पदार्थ का वह मूल रूप , जिसे रासायनिक अभिक्रिया द्वारा अन्य सरल पदार्थों में विभाजित नहीं किया जा सकता है , तत्व कहलाता है ।

जैसे :- सोडियम , ताँबा , लोहा आदि ।

 

तत्वों का वर्गीकरण :-

तत्वों को धातु , अधातु तथा उपधातुओं में वर्गीकृत किया जाता है ।

 

धातु :-

वे तत्व जो सामान्य अभिक्रियाओं में अपने परमाणुओं से एक अथवा अधिक इलेक्ट्रॉन का त्याग करते हैं , धातु कहलाते हैं ।

जैसे :- ताँबा , लोहा , चाँदी आदि ।

 

अधातु :-

वे तत्व , जो सामान्य अभिक्रियाओं में दूसरे तत्वों के परमाणुओं से इलेक्ट्रॉन ग्रहण करते हैं अधातु कहलाते हैं ।

जैसे :- ऑक्सीजन , क्लोरीन , आयोडीन , ब्रोमीन आदि ।

 

 

उपधातु :-

कुछ तत्व धातु और अधातु के बीच के गुणों को दर्शाते हैं जिन्हें उपधातु कहते हैं ।

जैसे :- बोरॉन , सिलिकन , जर्मेनियम आदि ।

 

यौगिक :-

वह पदार्थ जो दो या दो से अधिक तत्वों के नियत अनुपात में रासायनिक तौर पर संयोजन से बनता है यौगिक कहलाता है ।

जैसे :- चीनी , नमक , जल आदि ।

 

 

मिश्रण तथा यौगिक में अन्तर :-

 

मिश्रण :-

तत्व या यौगिक केवल मिश्रण बनाने के लिए मिलते हैं । कोई नया पदार्थ नहीं बनता है । किसी नए पदार्थ का निर्माण नहीं करते । संघटन परिवर्तनीय होता है । मिश्रण में उपस्थित घटक अपने गुण धर्मों को दर्शाते हैं । घटकों को भौतिक विधियों द्वारा सुगमता से पृथक किया जा सकता है ।

 

यौगिक :-

एक पदार्थ क्रिया करके नए पदार्थ का निर्माण करते हैं । नये पदार्थ का संघटन सदैव स्थाई होता है । अपने द्रव्यमान के अनुसार एक निश्चित अनुपात में ही एक साथ मिलते हैं । नये पदार्थ के गुण धर्म पूरी तरह भिन्न होते हैं । घटकों को केवल रासायनिक या वैद्युत रासायनिक प्रक्रिया द्वारा ही पृथक किया जा सकता है ।

 

 

 

अध्याय 3 – अणु और परमाणु

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