अध्याय 6 : जैव प्रक्रम

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 जैव प्रक्रम

 

सजीव वस्तुएँ :- वे सभी वस्तुएँ सजीव वस्तएँ कहलाती है , जिसमें पोषण , श्वसन , उत्सर्जन तथा वृद्धि जैसी क्रियाएँ होती है । जैसे :- जंतु और पौधे ।

 

निर्जीव वस्तुएँ :- वे सभी वस्तुएँ निर्जीव वस्तुएँ कहलाती है , जिसमें जीवन के कोई भी आवश्यक कार्य संपन्न नहीं होता । जैसे :- चट्टान , मिट्टी , लकड़ी इत्यादि ।

 

सजीव और निर्जीव में अंतर :-

निर्जीव सजीव

ये पोषण नहीं करते है । ये पोषण करते है ।

इनमें श्वसन नहीं होता है । इनमें श्वसन होता है ।

ये जनन नहीं करते है ।  ये जनन करते है ।

इनमें वृद्धि नहीं होता है । इनमें वृद्धि होता है ।

ये स्थान परिवर्तन नहीं करते है । ये स्थान परिवर्तन करते है ।

नोट :- विषाणु सजीव और निर्जीव दोनों होता है । ये सजीव कोशिका को संक्रमित करता है तो सजीव होता है तथा खुले वातावरण में निर्जीव होता है ।

 

 जैव प्रक्रम :-  वे सभी प्रक्रम जो संयुक्त रूप से जीव के अनुरक्षण का कार्य करते है , जैव प्रक्रम कहलाते हैं ।

जैव प्रक्रम में सम्मिलित प्रक्रियाएँ :- पोषण  श्वसन  वहन  उत्सर्जन

 

 पोषण :- भोजन ग्रहण करना , पचे भोजन का अवशोषण एवं शरीर द्वारा अनुरक्षण के लिए उसका उपयोग , पोषण कहलाता है ।

 

पोषण के प्रकार :- पोषण के आधार पर जीवों को दो समूह में बाँटा जा सकता है ।

स्वपोषी पोषण  विषमपोषी पोषण ( इसके तीन प्रकार होते हैं ) मृतजीवी पोषण जैसे :- कवक , बैक्टीरिया , प्रोटोजोआ परजीवी पोषण जैसे :- गोलकृमि , मलेरिया परजीवी प्राणिसम पोषण जैसे :- अमीबा , मेंढ़क , मनुष्य

 

स्वपोषी पोषण :-  पोषण का वह तरीका जिसमें जीव अपने आस – पास के वातावरण में उपस्थित सरल अजैव पदार्थों जैसे CO2 , पानी और सूर्य के प्रकाश से अपना भोजन स्वयं बनाता है । उदाहरण :- हरे पौधे ।

स्वपोषी पोषण हरे पौधों मे तथा कुछ जीवाणुओं जो प्रकाश संश्लेषण कर सकते हैं , में होता है ।

 स्वपोषी जीव की कार्बन तथा ऊर्जा की आवश्यकताएँ प्रकाश संश्लेषण द्वारा पूरी होती हैं ।

 

 प्रकाश संश्लेषण :-  यह वह प्रक्रम है जिसमें स्वपोषी बाहर से लिए पदार्थों को ऊर्जा संचित रूप में परिवर्तित कर देता है । ये पदार्थ कार्बन डाइऑक्साइड तथा जल के रूप में लिए जाते हैं , जो सूर्य के प्रकाश तथा क्लोरोफिल की उपस्थिति में कार्बोहाइड्रेट में परिवर्तित कर दिए जाते हैं ।

6CO₂ + 12H₂O = क्लोरोफिल/सूर्य का प्रकाश C₆H₁₂O₆ ( ग्लूकोज़ ) + 6O₂ + 6H₂O

 

 प्रकाश संश्लेषण के लिए आवश्यक कच्ची सामग्री :-

सूर्य का प्रकाश  क्लोरोफिल कार्बन डाइऑक्साइड – स्थलीय पौधे इसे वायुमण्डल से प्राप्त करते हैं ।  जल – स्थलीय पौधे , जड़ों द्वारा मिट्टी से जल का अवशोषण करते हैं ।

 

 प्रकाश संश्लेषण के दौरान होती घटनाएं :-

क्लोरोफिल द्वारा प्रकाश ऊर्जा को अवशेषित करना ।  प्रकाश ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में रूपांतरित करना तथा जल अणुओं का हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन में अपघटन ।  कार्बन डाईऑक्साइड का कार्बोहाइड्रेट में अपचयन ।

 

क्लोरोप्लास्ट :- पत्तियों की कोशिकाओं में जो हरे रंग के बिंदु दिखाई देते हैं । ये हरे बिंदु कोशिकांग हैं जिन्हें क्लोरोप्लास्ट कहते हैं इनमें क्लोरोफिल होता है ।

 

रंध्र :-  पत्ती की सतह पर जो सूक्ष्म छिद्र होते हैं , उन्हें रंध्र कहते हैं ।

 

रंध्र के प्रमुख कार्य :-

प्रकाश संश्लेषण के लिए गैसों का अधिकांश आदान – प्रदान इन्हीं छिद्रों के द्वारा होता है ।  वाष्पोत्सर्जन प्रक्रिया में जल ( जल वाष्प के रूप में ) रंध्र द्वारा निकल जाता है ।

 

 रंध्र की रचना और क्रिया :-  पत्तियों की सतह पर मौजूद रंध्रो को चारो ओर से दो कोशिकाएँ घेरे रहती है । जिन्हें द्वार कोशिका कहते है । ये कोशिकाएँ रंध्रो के खुलने या बंद होने के लिए उत्तरदायी है ।

 जब द्वार कोशिकाओं में जल अंदर जाता है तब वह फूल जाती है जिससे छिद्र खुल जाता है । जब द्वार कोशिकाएँ सिकुड़ती हैं तब छिद्र बंद हो जाता है । रंध्र से पर्याप्त मात्रा में जल की हानी होती है ।

 

 विषमपोषी पोषण :- पोषण का वह तरीका जिसमें जीव अपना भोजन स्वयं नहीं बना सकता , बल्कि अपने भोजन के लिए अन्य जीवों पर निर्भर होता है । उदाहरण :- मानव व अन्य जीव ।

 

विषमपोषी पोषण के प्रकार :- प्राणीसमपोषण मृतजीवी पोषण परजीवी पोषण

 

प्राणीसमपोषण :- इसमें जीव संपूर्ण भोज्य पदार्थ का अंतर्ग्रहण करते हैं तथा उनका पाचन शरीर के अंदर होता है । उदाहरण :- अमीबा , मानव ।

 

मृतजीवी पोषण :- मृतजीवी अपना भोजन मृतजीवों के शरीर व सड़े – गले कार्बनिक पदार्थों से प्राप्त करते हैं । उदाहरण :- फफूंदी , कवक ।

 

परजीवी पोषण :- परजीवी , अन्य जीवों के शरीर के अंदर या बाहर रहकर , उनको बिना मारे , उनसे अपना पोषण प्राप्त करते हैं । उदाहरण :- जोक , अमरबेल , जूँ , फीताकृमि ।

 

जीव अपना पोषण कैसे करते है 

एक कोशिकीय जीव :- एक कोशिकीय जीव अपना भोजन संपूर्ण सतह से ले सकते है । जैसे :- अमीबा , पैरामीशियम ।

 

अमीबा :- एक कोशीय अनिश्चित आकार वाला प्राणिसमपोषी जीव है ।  कुटपादों द्वारा भोजन ग्रहण करता है ।

अमीबा के भोजन :- शैवाल के छोटे टुकड़े , बैक्टीरिया , डायटम अन्य जीव एवं मृत कार्बनिक पदार्थ ।

 

अमीबा में पोषण :- अमीबा में पोषण तीन चरण में पूर्ण होते हैं 

अंतर्ग्रहण :- अमीबा कोशिकीय सतह से अँगुली जैसे अस्थायी प्रवर्ध की मदद से भोजन ग्रहण करता है । यह प्रवर्ध भोजन के कणों को घेर लेते हैं तथा संगलित होकर खाद्य रिक्तिका बनाते हैं ।

पाचन :- खाद्य रिक्तिका के अंदर जटिल पदार्थों का विघटन सरल पदार्थों में किया जाता है और वे कोशिकाद्रव्य में विसरित हो जाते हैं ।

बहिष्करण :- बचा हुआ अपच पदार्थ कोशिका की सतह की ओर गति करता है तथा शरीर से बाहर निष्कासित कर दिया जाता है ।

 

पैरामीशियम :- पैरामीशियम भी एककोशिक जीव है , इसकी कोशिका का एक निश्चित आकार होता है तथा भोजन एक विशिष्ट स्थान से ही ग्रहण किया जाता है । भोजन इस स्थान तक पक्ष्याभ की गति द्वारा पहुँचता है जो कोशिका की पूरी सतह को ढके होते हैं ।

 

बहु कोशिकीय जीव :- बहुकोशिकीय जीव में पोषण के लिए विभिन्न प्रकार के अंग तथा अंगतंत्र होता है । जैसे :- मानव

 

 

मनुष्य में पोषण :-

 

पोषण के चरण :- मुखगुहा → अमाशय → क्षुद्रांत्र / छोटी आत → बृहद्रां / बड़ी आत

 

मुखगुहा :-  भोजन को मुखगुहा में दाँतों द्वारा छोटे छोटे टुकड़ो में तोड़ा जाता हैं , और लार ग्रंथी से निकलने वाला लार या लालारस भोजन से पेशीय जिहा द्वारा मिलाया जाता है जिससे भोजन आसानी से आहार नाल में क्रमाकुचक गति द्वारा गमन करता है ।

लार मे एक एंजाइम होता है जिसे लार एमिलेस या टायलिन कहते है । यह मंड को शर्करा में खंडित करता है ।

 मनुष्य कि मुखगुहा में तीन जोड़ी लारग्रंथी होती है :- पैरोटिड ग्रंथी  सबमैंडिबुलर लारग्रंथी  सबलिंगुअल लारग्रंथी

 

अमाशय :-  मुहँ से आमाशय तक भोजन ग्रसिका या इसोफेगस द्वारा क्रमाकुंचक गति द्वारा ले जाया जाता है । आमाशय की पेशीय भित्ति भोजन को अन्य पाचक रसों के साथ मिश्रित करने मे सहायता करती है । अमाशय के भित्ति में उपस्थित जठर ग्रंथि जो हाइड्रोक्लोरिक अम्ल ( HCL ) , प्रोटीन पाचक एंजाइम पेप्सिन तथा श्लेमा का स्रावण करती है ।

 

जठर रसों या पाचक एंजाइम के कार्य :-

हाइड्रोक्लोरिक अम्ल ( HCL ) :- यह एक अम्लीय माध्यम तैयार करता है जो निष्क्रिय पेप्सिनोजेन को सक्रिय पेप्सिन में बदलने का काम करता है । साथ ही HCL जीवाणुनाशक की तरह काम करता है , भोजन में आनेवाले बैक्टीरिया को नष्ट करता है ।

पेप्सिन एंजाइम :- पेप्सिन प्रोटीन को पचाने का कार्य करता हैं ।

श्लेष्मा या म्यूकस :- म्यूकस आमाशय की दीवार तथा जठर ग्रंथियों को हाइड्रोक्लोरिक अम्ल ( HCL ) तथा एंजाइम पेप्सिन से सुरक्षित रखता है ।

नोट :- मनुष्य के आमाशय में प्रतिदिन ३ लीटर जठर रस का स्त्राव होता है । आमाशय में प्रोटीन के साथ – साथ वासा का आंशिक पाचन एंजाइम गैस्ट्रिक लाइपेज के द्वारा होता है ।

 

क्षुद्रांत्र / छोटी आँत :-

आमाशय से भोजन क्षुद्रांत्र में प्रवेश करता है यह अवरोधिनी पेशी द्वारा नियंत्रित होता है । यहाॅ कार्बोहाइड्रेट , प्रोटीन , तथा वसा के पूर्ण पाचन का स्थल होता है ।

 यहाँ आमाशय से आने वाला भोजन अम्लीय होता है जिसको अग्न्याशयिक एंजाइम के क्रिया के लिए क्षारीय माध्यम यकृत से स्रावित पित्तरस द्वारा किया जाता है ।

 वसा आँत में बड़ी गोलिकाओं के रूप में होता है जिसपर एंजाइम का कार्य मुश्किल होता है , एंजाइम के क्रियाशिलता को बढ़ाने के लिए पित्त लवण उसे छोटे गोलिकाओं में खण्डित कर देता है जिससे एंजाइम की क्रियाशीलता बढ़ जाती है । इस क्रिया को इमल्सीकरण कहते है ।

अग्न्याशयिक रस के कार्य :- अग्न्याशय अग्न्याशयिक रस का स्रावण करता है जिसमें प्रोटीन पाचन के लिए ट्रिप्सिन एंजाइम तथा इमल्सीकृत वासा के पाचन के लिए लाइपेज एंजाइम होता है ।

आंत्र रस के कार्य :- क्षुद्रात्र ग्रंथियों द्वारा आंत्र रस स्रावित होती है जिसमें उपस्थित एंजाइम अंत में प्रटीन को अमिनो अम्ल , जटिल कार्बोहाइड्रेट को ग्लुकोज में तथा वसा को वसा अम्ल तथा ग्लिसरॉल में परिवर्तित कर देता है ।

क्षुद्रांत्र / छोटी आँत की संरचना :- पाचित भोजन को आंत की भित्ति अवशोषित कर लेती है । क्षुद्रांत्र के आंतरिक आस्तर पर अनेक अँगुली जैसे प्रवर्ध होते हैं जिन्हें दीर्घरोम कहते हैं ये अवशोषण का सतही क्षेत्रफल बढ़ा देते हैं । दीर्घरोम में रुधिर वाहिकाओं की जाल होती है । जो भोजन को अवशोषित करके शरीर की प्रत्येक कोशिका तक पहुँचाते हैं । यहाँ इसका उपयोग ऊर्जा प्राप्त करने , नए ऊतकों के निर्माण और पुराने ऊतकों की मरम्मत में होता है ।

 

बृहदांत्रा या बड़ी आँत :-  बिना पचा भोजन बृहदांत्रा में भेज दिया जाता है जहाँ अधिक संख्या में दीर्घरोम इस पदार्थ में से जल का अवशोषण कर लेते हैं । अन्य पदार्थ गुदा द्वारा शरीर के बाहर कर दिया जाता है । इस वर्ज्य पदार्थ का बहिःक्षेपण गुदा अवरोधिनी द्वारा नियंत्रित किया जाता है ।

 

मनुष्य के दाँतों के प्रकार :- एक व्यस्क मनुष्य के मुखगुहा में कुल 32 दाँत होते है ।

 दाँत चार प्रकार के होते है :- कर्तनक या इनसाइजर ,  भेदक या कैनाइन ,  अग्रचर्वणक या प्रीमोलर ,  चर्वणक या मोलर ।

 

दंतक्षरण :- मुख में कार्बोहाइड्रेट का पाचन लार द्वारा शर्करा में होता है , जिसपर जिवाणु क्रिया करके अम्ल बनाते है । जिससे इनैमल का मृदुकरण होता है । अनेक जिवाणु खाद्यकणों के साथ मिलकर दाँतों पर चिपककर दंत प्लाक बनाते है जो दाँत को ढँक लेता है । इसे ब्रस द्वारा नहीं हटाया गया तो वे मज्जा में पहुचकर जलन पैदा करते है । इस प्रकार दंतक्षरण शुरू होता है ।

 

श्वसन :- पोषण प्रक्रम के दौरान ग्रहण की गई खाद्य सामग्री का उपयोग कोशिकाओं में होता हैं जिससे विभिन्न जैव प्रक्रमों के लिए ऊर्जा प्राप्त होती है । ऊर्जा उत्पादन के लिए कोशिकाओं में भोजन के विखंडन को कोशिकीय श्वसन कहते हैं ।

 

श्वसन के प्रकार :-

श्वसन दो प्रकार के होते है :- वायवीय श्वसन  अवायवीय श्वसन

 

वायवीय श्वसन :-  कोशिका के कोशिका द्रव्य में मौजूद कोशिकांग माइटोकॉण्ड्रिया में पायरूवेट का विखण्डन ऑक्सीजन के उपस्थिति में होता है । इस अभिक्रिया को वायवीय श्वसन कहते है । परिणाम स्वरूप जल , CO2 और उर्जा की प्राप्ती होती है । ऊर्जा ATP में संचित हो जाती है । वायवीय श्वसन में अधिक ऊर्जा उत्पन्न होता है ।

 

अवायवीय श्वसन :- कोशिका के कोशिका द्रव्य में ग्लूकोज का आंशिक विखण्डन ऑक्सीजन के अनुपस्थिति में एंजाइम की मदद से होता है । इसे ही अवायविय श्वसन कहते है । परिणाम स्वरूप इथेनॉल , लैक्टिक अम्ल तथा CO2 का निर्माण होता है । इसमें आंशिक उर्जा की प्राप्ति होती है तथा CO2 के दो अणु बनते है ।

 

वायवीय श्वसन एवं अवायवी श्वसन में अंतर   वायवीय श्वसन  अवायवी श्वसन

ऑक्सीजन की उपस्थिति में होता है ।  ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में होता है ।

ग्लूकोज का पूर्ण उपचयन होता है कार्बनडाइऑक्साइड , पानी और ऊर्जा मुक्त होती है ।  ग्लूकोज का अपूर्ण उपचयन होता है , जिसमें एथेनॉल , लैक्टिक अम्ल , कार्बन डाइऑक्साइड और ऊर्जा मुक्त होती है ।

यह कोशिका द्रव्य व माइटोकान्ड्रिया में होता है ।  यह केवल कोशिका द्रव्य में होता है ।

अधिक ऊर्जा उत्पन्न होती है । ( 36ATP )  कम ऊर्जा उत्पन्न होती है । ( 2ATP )

उदारहण :- मानव

उदाहरण :- यीस्ट

नोट :- कोशिकीय श्वसन द्वारा निकली ऊर्जा ATP के रूप में संचित हो जाती है , जिसे कोशिका ईंधन के रूप उपयोग होता है ।  ATP :- एडिनोसीन ट्राई फास्फेट ।  कोशिकीय श्वसन आंतरोष्मि या उष्माक्षेपी अभिक्रिया है ।

 

पौधों में रात्रि तथा दिन में निम्न घटनाएँ होती हैं :-

 

रात्रि में :– प्रकाशसंश्लेषण नहीं होता है जिसके कारण कार्बनडाइऑक्साइड का निष्कासन मुख्य घटना है ।

 

दिन में :– श्वसन के दौरान निकली CO2 प्रकाशसंश्लेषण में प्रयुक्त हो जाती है , जिससे केवल ऑक्सिजन का निकलना मुख्य घटना है ।

 

जलीय जीवों में श्वसन :-  जलीय जीव जल में विलेय ऑक्सिजन का उपयोग करते है । जल में ऑक्सिजन की मात्रा कम होने के कारण इनकी श्वास दर स्थलीय जीव के अपेक्षा कम होती है ।

 जैसे :- मछली अपने मुँह द्वारा जल लेकर , उसे बलपूर्वक क्लोम तक पहुँचाती है जहाँ विलेय ऑक्सिजन रूधिर ले लेता है ।

 

कुछ जीवों के श्वसन अंग :-

जीवों के नाम श्वसन अंग

मछली गलफड़ या गिल्स

मच्छर श्वासनली या ट्रैकिया

केंचुआ त्वचा

मनुष्य फेफड़ा

 

मानव श्वसन तंत्र :- नासाद्वार → ग्रसनी → कंठ → श्वास नली → श्वसनी  → श्वसनिका → फुफ्फुस ( फेफड़े ) → कूपिका कोश → रुधिर वाहिकाएं

 

 मानव श्वसन तंत्र की क्रियाविधि :-

मनुष्य के शरीर के अंदर वायु नासाद्वार द्वारा जाती है ।  नाक में उपस्थित महीन बाल व श्लेष्मा वायु के साथ अंदर जाने वाली अशुद्धियों को रोक लेते हैं । यह अशुद्धियाँ परागकण , धूल मिट्टी , जीवाणु राख आदि हो सकती हैं ।  नासाद्वार से अंदर आ चुकी वायु ग्रसनी व कंठ से होते हुए श्वास नली में प्रवेश करती है ।

 

ग्रसनी :- यह श्वसन व पाचन तंत्र के लिए समान मार्ग है ।

 

कंठ या स्वर यंत्र :- यह श्वास नली के ऊपर व ग्रसिका के सामने उपस्थित एक नली है , जिसकी लंबाई वयस्कों में लगभग 5 cm होती है ।

कंठ में उपास्थि के वलय उपस्थित होते हैं । यह सुनिश्चित करता है कि वायु मार्ग निपतित न हो । श्वास नली से होकर वायु श्वसनी के माध्यम से फुफ्फुस में प्रवेश करती हैं ।  फुफ्फुस के अंदर मार्ग छोटी और छोटी नलिकाओं में विभाजित हो जाता है जो अंत में गुब्बारे जैसी रचना में अंतकृत हो जाता है जिसे कूपिका कहते हैं ।  कूपिका एक सतह उपलब्ध कराती है जिससे गैसों का विनिमय हो सकता है । कृपिकाओं की भित्ति में रुधिर वाहिकाओं का विस्तीर्ण जाल होता है । जब हम श्वास अंदर लेते हैं , हमारी पसलियाँ ऊपर उठती हैं और हमारा डायाफ्राम चपटा हो जाता है , इसके परिणामस्वरूप वक्षगुहिका बड़ी हो जाती है ।  इस कारण वायु फुफ्फुस के अंदर चूस ली जाती है और विस्तृत कूपिकाओं को भर लेती है ।  रुधिर शेष शरीर से कार्बन डाइऑक्साइड कूपिकाओं में छोड़ने के लिए लाता है । कूपिका रुधिर वाहिका का रुधिर कूपिका वायु से ऑक्सीजन लेकर शरीर की सभी कोशिकाओं तक पहुँचाता है ।

 

 मानव श्वसन क्रिया :-

अंतः श्वसन अंतः श्वसन के दौरान :-  उच्छवसन

वृक्षीय गुहा फैलती है । वृक्षीय गुहा अपने मूल आकार में वापिस आ जाती है ।

पसलियों से संलग्न पेशियां सिकुड़ती हैं । पसलियों की पेशियां शिथिल हो जाती हैं ।

वक्ष ऊपर और बाहर की ओर गति करता है । वक्ष अपने स्थान पर वापस आ जाता है ।

गुहा में वायु का दाब कम हो जाता है और वायु फेफड़ों में भरती है । गुहा में वायु का दाब बढ़ जाता है और वायु ( कार्बन डाइऑक्साइड ) फेफड़ों से बाहर हो जाती है ।

 

 संवहन :-  मनुष्य में भोजन , ऑक्सीजन व अन्य आवश्यक पदार्थों की निरंतर आपूर्ति करने वाला तंत्र , संवहन तंत्र कहलाता है ।

 

 मानव में वहन :-  मानव संवहन तंत्र के मुख्य अवयव :- हृदय रक्त नलिकाएं ( धमनी व शिरा )  वहन माध्यम ( रक्त व लसीका )

 

हमारा पंप – हृदय :-

हृदय एक पेशीय अंग है जो हमारी मुट्ठी के आकार का होता है ।  ऑक्सीजन प्रचुर रुधिर को कार्बन डाइऑक्साइड युक्त रुधिर से मिलने को रोकने के लिए हृदय कई कोष्ठों में बँटा होता है ।  हृदय का दायाँ व बायाँ बँटवारा ऑक्सीजनित तथा विऑक्सीजनित रुधिर को मिलने से रोकने में लाभदायक होता है । मानव हृदय एक पम्प की तरह होता है जो सारे शरीर में रुधिर का परिसंचरण करता है । हृदय में उपस्थित वाल्व रुधिर प्रवाह को उल्टी दिशा में रोकना सुनिश्चित करते हैं ।

 

 रक्तदाब :- रुधिर वाहिकाओं की भित्ति के विरुद्ध जो दाब लगता है उसे रक्तदाब कहते हैं ।

 

रक्त नलिकाएं :-

धमनी  शिरा

 

धमनी :- धमनी वे रुधिर वाहिकाएँ हैं जो रुधिर को हृदय से शरीर के विभिन्न अंगों तक ले जाती हैं ।  धमनी की भित्ति मोटी तथा लचीली होती है क्योंकि रुधिर हृदय से उच्च दाब से निकलता है । वाल्व नहीं होते ।  ये सतही नहीं होती , उत्तकों के नीचे पाई जाती हैं ।

 

शिरा :- शिराएं विभिन्न अंगों से अनॉक्सीकृत रुधिर एकत्र करके वापस हृदय में लाती हैं । अपवाद फुफ्फुस – शिरा  शिरा की भित्ति कम मोटी व कम लचीली होती है ।  वाल्व होते हैं । ये सतही होती हैं ।

 

लसीका :- एक तरल उत्तक है , जो रुधिर प्लाज्मा की तरह ही है ; लेकिन इसमें अल्पमात्रा में मोटीन होते हैं । लसीका वहन में सहायता करता है ।

 

पादपों में परिवहन :- पादप तंत्र का एक अवयव है , जो मृदा से प्राप्त जल और खनिज लवणों का वहन करता है जबकि फ्लोएम पत्तियों द्वारा प्रकाश संश्लेषित उत्पादों को पौधे के अन्य भागों तक वहन करता है ।

जड़ व मृदा के मध्य आयन साद्रण में अंतर के चलते जल मृदा से जड़ों में प्रवेश कर जाता है तथा इसी के साथ एक जल स्तंभ निर्माण हो जाता है , जो कि जल को लगातार ऊपर की ओर धकेलता है ।

यही दाब जल को ऊँचे वृक्ष के विभिन्न भागों तक पहुचाता है । यही जल पादप के वायवीय भागों द्वारा वाष्प के रूप में वातावरण में विलीन हो जाता है , यह प्रकम वाष्पोत्सर्जन कहलाता है । इस प्रकम द्वारा पौधों को जल के अवशोषण एवं जड़ से पत्तियों तक जल तथा विलेय खनिज लवणों के उपरिमुखी गति में तथा पौधों में ताप नियमन में सहायता मिलती है ।

 

पौधों में भोजन तथा दूसरे पदार्थों का स्थानांतरण :- प्रकाश संश्लेषण के विलेय उत्पादों का वहन स्थानांतरण कहलाता है जो कि फ्लोएम ऊतक द्वारा होता है ।  स्थानांतरण पत्तियों से पौधों के शेष भागों में उपरिमुखी तथा अधोमुखी दोनों दिशाओं में होता है ।  फ्लोएम द्वारा स्थानातरण ऊर्जा के प्रयोग से पूरा होता है ।  अतः सुक्रोज फ्लोएम ऊतक में ए.टी.पी. ऊर्जा से परासरण बल द्वारा स्थानांतरित होता है ।

 

उत्सर्जन :- वह जैव प्रकम जिसमें जीवों में उपापचयी क्रियाओं में जनित हानिकारक नाइट्रोजन युक्त पदार्थों का निष्कासन होता है , उत्सर्जन कहलाता है ।  एक कोशिकीय जीव इन अपशिष्ट पदार्थों को शरीर की सतह से जल में विसरित कर देते हैं ।

 

मानव में उत्सर्जन :-  मानव के उत्सर्जन तंत्र में एक जोड़ा वृक्क , एक मूत्रवाहिनी , एक मूत्राशय तथा एक मूत्रमार्ग होता है । वृक्क उदर में रीढ़ की हड्डी के दोनों ओर स्थित होते हैं । वृक्क में मूत्र बनने के बाद मूत्रवाहिनी में होता हुआ मूत्राशय में आ जाता है तथा यहाँ तब तक एकत्र रहता है जब तक मूत्रमार्ग से यह निकल नहीं जाता है ।

 

मूत्र बनने का उद्देश्य :-  मूत्र बनने का उद्देश्य रुधिर में से वर्ज्य ( हानिकारक अपशिष्ट ) पदार्थों को छानकर बाहर करना है ।

 

वृक्क में मूत्र निर्माण प्रक्रिया :- वृक्क की संरचनात्मक व क्रियात्मक इकाई वृक्काणु कहलाती है । वृक्काणु के मुख्य भाग इस प्रकार हैं ।

केशिका गुच्छ ( ग्लोमेरुलस ) :- यह पतली भित्ति वाला रुधिर कोशिकाओं का गुच्छा होता है ।  बोमन संपुट  नलिकाकार भाग  संग्राहक वाहिनी

 

वृक्क में उत्सर्जन की क्रियाविधि :-

 

केशिका गुच्छ निस्यंदन :- जब वृक्क – धमनी की शाखा वृक्काणु में प्रवेश करती है , तब जल , लवण , ग्लूकोज , अमीनों अम्ल व अन्य नाइट्रोजनी अपशिष्ट पदार्थ , कोशिका गुच्छ में से छनकर वोमन संपुट में आ जाते हैं ।

 

वर्णात्मक पुन :- अवशोषण :- वृक्काणु के नलिकाकार भाग में , शरीर के लिए उपयोगी पदार्थों , जैसे ग्लूकोज , अमीनो अम्ल , लवण व जल का पुनः अवशोषण होता है ।

 

नलिका स्रावण :- यूरिया , अतिरिक्त जल व लवण जैसे उत्सर्जी पदार्थ वृक्काणु के नलिकाकार भाग के अंतिम सिरे में रह जाते हैं व मूत्र का निर्माण करते हैं । वहां से मूत्र संग्राहक वाहिनी व मूत्रवाहिनी से होता हुआ मूत्राशय में अस्थायी रूप से संग्रहित रहता है तथा मूत्राशय के दाब द्वारा मूत्रमार्ग से बाहर निकलता है ।

 

कृत्रिम वृक्क ( अपोहन ) :- यह एक ऐसी युक्ति है जिसके द्वारा रोगियों के रुधिर में से कृत्रिम वृक्क की मदद से नाइट्रोजन युक्त अपशिष्ट पदार्थों का निष्कासन किया जाता है ।

प्राय : एक स्वस्थ व्यस्क में प्रतिदिन 180 लीटर आरंभिक निस्यंदन वृक्क में होता है । जिसमें से उत्सर्जित मूत्र का आयतन 1.2 लीटर है । शेष निस्यंदन वृक्कनलिकाओं में पुनअवशोषित हो जाता है ।

 

पादप में उत्सर्जन :-

वाष्पोत्सर्जन प्रक्रिया द्वारा पादप अतिरिक्त जल से छुटकारा पाते हैं ।  बहुत से पादप अपशिष्ट पदार्थ कोशिकीय रिक्तिका में संचित रहते हैं ।  अन्य अपशिष्ट पदार्थ ( उत्पाद ) रेजिन तथा गोंद के रूप में पुराने जाइलम में संचित रहते हैं ।  पादप कुछ अपशिष्ट पदार्थों को अपने आसपास मृदा में उत्सर्जित करते हैं ।

 

 

 

 

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