अध्याय 2 : संघवाद | Federalism

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संघवाद क्या है। भारत में संघीय व्यवस्था। भारत में विकेंद्रीकरण।
भाषायी राज्य , भाषा-नीति , केंद्र-राज्य संबंध गठबंधन सरकार।

 

❍ संघवाद:- संघवाद से अभिप्राय है कि एक ऐसी शासन व्यवस्था जिसमें देश की सर्वोच्च सत्ता केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के बीच बंटी होती है।

 

❍ संघवाद क्या है:-ज्ञातव्य है कि संघवाद (Federalism) शब्द की उत्पत्ति लैटिन शब्द ‘Foedus’ से हुई है जिसका अर्थ है एक प्रकार का समझौता या अनुबंध।

○ संघवाद सरकार का वह रूप है जिसमें देश के भीतर सरकार के कम-से-कम दो स्तर मौजूद हैं:-

 

पहला केंद्रीय स्तर पर और दूसरा स्थानीय या राज्यीय स्तर पर।

○ भारतीय संविधान के संघात्मक लक्षण :-

1. संविधान की सर्वोच्चता,

2.स्वतन्त्र उच्चतम न्यायालय।

3. लिखित और कठोर संविधान,

4. संविधान के द्वारा केन्द्रीय सरकार और इकाइयों की सरकारों में शक्तियों का विभाजन,

 

भारत, क्षेत्र और जनसंख्या की दृष्टि से अत्यधिक विशाल और बहुत अधिक विविधताओं से परिपूर्ण है, ऐसी स्थिति में भारत के लिए संघात्मक शासन व्यवस्था को ही अपनाना स्वाभाविक था और भारतीय संविधान के द्वारा ऐसा ही किया गया है। संविधान के प्रथम अनुच्छेद में कहा गया है कि ’’भारत, राज्यों का एक संघ होगा।

26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान अपनाया गया था तभी से भारतीय नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के स्वतंत्रता व समानता प्रदान की गई है। भारतीय संविधान में संघात्मक व्यवस्था को अपनाया गया है।

इसमें राष्ट्रपति देश प्रमुख व प्रधानमंत्री सरकार प्रमुख होता है।

भारत का प्रधानमंत्री बहुमत दल प्राप्त नेता को बनाया जाता है।

 

 

❍ संघीय व्यवस्था :- संविधान ने मौलिक रूप से दो स्तरीय शासन व्यवस्था का प्रावधान किया था।

केंद्र सरकार को पूरे भारतीय संघ का प्रतिनिधित्व करना था।

राज्य सरकार को राज्य का प्रतिनिधित्व करना था।

स्थानीय सरकार को गाँव और शहर के गाँव का प्रतिनिधित्व करना था।

1. यहाँ सरकार दो या अधिक स्तरों वाली होती है।

2. अलग-अलग स्तर की सरकारें एक ही नागरिक समूह पर शासन करती हैं पर कानून बनाने , कर वसूलने और प्रशासन का उनका अपना-अपना अधिकार-क्षेत्र होता है।

3.विभिन्न स्तरों की सरकारों के अधिकार क्षेत्र संविधान में स्पष्ट रूप से वर्णित होते हैं। सरकार के हर स्तर के अस्तित्व और प्राधिकार की गारंटी और सुरक्षा देता है।

4. संविधान के मौलिक प्रावधानों को किसी एक स्तर की सरकार अकेले नहीं बदल सकती। दोनों स्तर की सरकारों की सहमति से ही हो सकते हैं।

5. अदालतों को संविधान और विभिन्न स्तर की सरकारों के अधिकारों की व्याख्या करने का अधिकार है। केंद्र और राज्य सरकार के बीच विवादो का निपटारा सर्वोच्च न्यायालय करता है।

 

 

❍ भारत में संघीय व्यवस्था

1. संघ सूची (Union List) :- संघीय सूची में राष्ट्रीय महत्त्व के 99 विषय सम्मिलित किए गए है। भारत की संसद को प्रतिरक्षा, सशस्त्र सेनायें, अणु शक्ति, विदेशी कार्य, राजनयिक प्रतिनिधित्व, युद्ध व सन्धि, डाक – तार, दूरभाष, संचार, रेल, बन्दरगाह, हवाई मार्ग, सिक्का, टंकण, विदेशी विनिमय, विदेशी ऋण, भारतीय रिजर्व बैंक, नागरिकता व जनगणना आदि विषयों पर कानून बनाने का अधिकार है।

2. राज्य सूची ( State List ):- इसमें 66 विषय हैं। सातवें संविधान संशोधन, 1956 द्वारा सम्पत्ति के अधिग्रहण सम्बन्धी प्रविष्टि राज्य सूची से हटा दी गयी थी तथा 42 वें संशोधन, 1976 द्वारा राज्य सूची के विषय शिक्षा, वन, जंगली जानवर व पक्षियों की रक्षा तथा नाप तौल हटा दिये गये हैं तथा समवर्ती सूची में सम्मिलित कर दिए गए हैं।

राज्य सूची के प्रमुख विषय है – पुलिस, न्याय, जेल, स्थानीय स्वशासन, सार्वजनिक स्वास्थ्य, कृषि, सिंचाई, सड़कें आदि।

इन विषयों पर कानून बनाने का अधिकार राज्य विधान मण्डलों को है। इस प्रकार वर्तमान में राज्य सूची के विषयों की संख्या 61 है।

 

 

3.समवर्ती सूची ( Concurrent List ):- मूल संविधान में इस सूची में 47 विषय रखे गये थे किन्तु 42 वें संविधान संशोधन द्वारा पांच विषय और जोड़ दिये गये हैं । वर्तमान में समवर्ती सूची के विषयों की संख्या बढ़कर 52 हो गई है ।

समवर्ती सूची के प्रमुख विषय फौजदारी, विधि और विधि निर्माण की प्रक्रिया, विवाह विच्छेद, कारखाने, श्रमिक संघ, औद्योगिक विवाद, सामाजिक सुरक्षा, सामाजिक बीमा, शिक्षा, जनसंख्या नियन्त्रण और परिवार नियोजन, वन, जंगली जानवर व पशुओं की रक्षा तथा नाप तौल आदि हैं।

इस विषय में केन्द्र व राज्य दोनों ही कानून बना सकते हैं। यदि केन्द्र व राज्य दोनों में मतभेद हो तो केन्द्र का कानून मान्य होगा।

 

 

❍ संघीय व्यवस्था कैसे चलती है

○ भाषायी राज्य:- स्वाधीनता के बाद, 1950 के दशक में भारत के कई पुराने राज्यों की सीमाएँ बदलीं। ऐसा यह सुनिश्चित करने के लिए किया गया कि एक भाषा बोलने वाले, एक ही प्रकार की संस्कृति, भूगोल अथवा जातीयताओं को मानने वाले लोग एक ही राज्य में रह सकें।

○ भाषा-नीति:- हमारे संविधान में किसी एक भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं दिया गया। जबकि हिन्दी को राजभाषा माना गया पर केन्द्र सरकार ने हिन्दी को उन राज्यों पर नहीं थोपा, जो कोई और भाषा बोलते हैं। भारतीय संविधान में हिन्दी के अलावा अन्य 21 भाषाओं को अनुसूचित भाषा का दर्जा दिया गया है।

○ केन्द्र-राज्य संबंध:- केन्द्र राज्य संबंधों में लगातार आए बदलाव से पता लगता है कि व्यवहार में संघवाद किस तरह मजबूत हुआ है। जबकि भारतीय संविधान ने केन्द्र तथा राज्य सरकारों की शक्तियों को बाँट रखा है, परन्तु फिर भी कई प्रकार से केन्द्र सरकार राज्य सरकारों पर प्रभाव जमा सकती है।

 

 

○ भाषायी राज्य :– राज्य पुनर्गठन अधिनियम दिसम्बर 1953 में फज़ल अली के नेतृत्व में राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन किया गया था। इस आयोग ने 30 सितम्बर, 1955 को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। इस रिपोर्ट के आधार पर “राज्य पुनर्गठन अधिनियम ” को 1956 में पारित किया गया।

• एक अक्टूबर, 1953 को आंध्र प्रदेश भाषायी आधार पर गठित होने वाला देश का पहला राज्य बना था

• 1नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ 26वां राज्य, 9 नवंबर 2000 में उत्तरांचल (अब उत्तराखंड) 27वां राज्य, 15 नवंबर 2000 को झारखंड

• 28वां राज्य और 02 जून 2014 को तेलंगाना को भारत का 29वां राज्य बनाया गया।

 

 

○ भाषा नीति :-भाषा नीति यह है कि सरकार या तो आधिकारिक तौर पर कानून, अदालत के निर्णयों या नीति के माध्यम से भाषाओं का उपयोग कैसे किया जाता है, राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को पूरा करने के लिए आवश्यक भाषा कौशल विकसित करना या भाषाओं का उपयोग और रखरखाव करने के लिए व्यक्तियों या समूहों के अधिकार स्थापित करना है।

हिंदी को राजभाषा माना गया पर हिंदी सिर्फ 40 फ़ीसदी भारतीयों की मातृभाषा है।

• संविधान में 22 भाषाओं को अनुसूचित भाषा का दर्जा दिया गया है।

• 14 सितंबर, 1949 को संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में लिखी हिंदी को भारत की आधिकारिक भाषा के तौर पर स्वीकार किया था।

• भारत के संविधान के अनुच्छेद 343 के तहत हिंदी भारत की ‘राजभाषा’ यानी राजकाज की भाषा मात्र है।

• दूसरी भाषा – हिंदी भाषी राज्यों में, दूसरी भाषा कुछ अन्य आधुनिक भारतीय भाषा या अंग्रेजी होगी, और – गैर-हिंदी भाषी राज्यों में, दूसरी भाषा हिंदी या अंग्रेजी होगी।

 

 

○ केंद्र-राज्य संबंध :- भारत का संविधान अपने स्वरूप में संघीय है तथा समस्त शक्तियाँ (विधायी, प्रशासनिक और वित्तीय) केंद्र एवं राज्यों के मध्य विभाजित हैं।

○ संविधान के भाग- XI में अनुच्छेद 245 से 255 तक केन्द्र-राज्य विधायी संबंधों की चर्चा की गई है। इसके अतिरिक्त कुछ अन्य अनुच्छेद भी इस विषय से संबंधित हैं।

 ○ गठबन्धन सरकार एक संसदीय सरकार की कैबिनेट होती हैं, जिसमें कई राजनीतिक दल सहयोग करते हैं, जिससे गठबन्धन के भीतर किसी भी एक दल का प्रभुत्व कम रहता हैं। इस व्यवस्था का आम कारण यह दिया जाता हैं कि कोई दल अपने बलबूते संसद में बहुमत प्राप्त नहीं कर सकता।

•राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन या राजग National Democratic Alliance or NDA) भारत में एक राजनीतिक गठबन्धन है। इसका नेतृत्व भारतीय जनता पार्टी करती है। इसके गठन के समय इसके 13 सदस्य थे।

• संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन या संप्रग (United Progressive Alliance or UPA) भारत में एक राजनीतिक गठबन्धन है। इसका नेतृत्व भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस करती है।

 

 

○ भारत में विकेंद्रीकरण :- शासन-सत्ता को एक स्थान पर केंद्रित करने के बजाय उसे स्थानीय स्तरों पर विभाजित किया जाए, ताकि आम आदमी की सत्ता में भागीदारी सुनिश्चित हो सके और वह अपने हितों व आवश्यकताओं के अनुरूप शासन-संचालन में अपना योगदान दे सके।

 • 1992 में संविधान में संशोधन

73 वाँ ग्रामीण              74 वाँ शहर

1. ग्राम पंचायत          1. नगर पंचायत
2. मंडल / तालुका      2. नगर निगम
3. जिला पंचायत         3. नगरपालिका

 

 

 संवैधानिक संशोधन अधिनियम सन् 1993 द्वारा, स्थानीय नगरीय शासन को, संवैधानिक दर्जा प्रदान करने किया गया है-
 

• अब स्थानीय स्वशासी निकायों के चुनाव नियमित रूप से कराना।

• निर्वाचित स्वशासी निकायों के लिए अनुसूचित जातियों , अनुसूचित जनजातियों और पिछड़े जातियों के लिए आरक्षित हैं।

• कम से कम एक तिहाई पद महिलाओं के लिए आरक्षित हैं।

• राज्य चुनाव आयोग द्वारा पंचायत और नगरपालिका का चुनाव कराया जाता हैं।

 

 

 

 

अध्याय 3 : लोकतंत्र और विविधता

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